फिजिक्स का सबसे सफल "असफल प्रयोग"
यह वह प्रयोग था जिसने आइंस्टीन के सापेक्षिता सिद्धांतो और क्वांटम भौतिकी की नींव रखने में अभूतपूर्व योगदान दिया। इस एक प्रयोग ने वैज्ञानिक समाज को अपने कई मूल सिद्धांतो की जाँच करने के लिए फिर से मजबूर कर दिया और आज के परिपेक्ष्य में जब आधुनिक भौतिकी शब्द अप्रासंगिक है तब इस सिद्धांत ने चिरसम्मत भौतिकी से वैज्ञानिक ज्ञान को आधुनिक भौतिकी अर्थात मॉडर्न फिजिक्स की तरफ मोड़ दिया था।
This is the story of the world's most successful "failed experiment". This is the story of Michelson-Morley Experiment .
माइकलसन -मोरले प्रयोग की 1887 जुलाई में वेस्टर्न रिजर्व विश्वविद्यालय के छात्रावास में दो भौतिक वैज्ञानिकों द्वारा किया गया था।
पहले भौतिक वैज्ञानिक अल्बर्ट इब्राहिम माइकलसन (ALBERT ABRAHAM MICHELSON) थे। इनका जन्म पोलैंड में हुआ था। जब वह तीन वर्ष के थे तब उनके माता-पिता 1855 में ही अमेरिका आ गए थे। 17 वर्ष की उम्र में उन्होंने U.S. नेवल एकेडमी में प्रवेश लिया, जहां प्रकाशिकी(Optics) की कक्षा में वह प्रथम थे। भौतिकी में अमेरिका का पहला नोबेल पुरस्कार 1907 में प्राप्त करने वाले माइकलसन पहले वैज्ञानिक थे।
दूसरे वैज्ञानिक एडवर्ड विलियम मोरले (EDWARD WILLIAMS MORLEY)थे। मोर्ले नेवार्क(Newark) न्यू जर्सी में जन्मे थे। 22 वर्ष की उम्र में विलियम कॉलेज से ग्रेजुएट हुए थे और 1863 में अपनी मास्टर्स पूरी करने के बाद वह अमेरिकन ग्रह युद्ध (1861-1865) के मध्य स्वच्छता आयोग में नौकरी करने लगे। इनके पिताजी मिनिस्टर थे और इनके जीवन का रास्ता भी लगभग तय ही था।
माइकलसन 1887 में केस अनुप्रयुक्त तकनीक संस्थान (Case Institute of Applied Technology) मे कार्यरत थे और मोरले वेस्टर्न रिजर्व यूनिवर्सिटी में कार्यरत थे। कालांतर में क्लीवलैंड नगर के इन दोनों संस्थानों को मिलाकर "केस वेस्टर्न रिजर्व विश्वविद्यालय" बना दिया गया।
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यह था वैज्ञानिकों का संक्षिप्त बैकग्राउंड अब आगे बढ़ने से पहले आप निम्न बिंदु समझ लीजिए :-
- 1865 में जेम्स क्लार्क मैक्सवेल ने विद्युत और चुम्बकत्त्व पर अपनी चार समीकरण प्रकाशित की थी और दोनों सिद्धांतों को एक कर दिया था। जिससे उत्पन्न विद्युतचुंबकीय सिद्धांत(Electromagnetic Theory) हुआ। मैक्सवेल की मृत्यु के कुछ 9 वर्ष बाद 1888 में जर्मन भौतिक वैज्ञानिक हेनरिक रुडोल्फ हर्टज ने रेडियो तरंगो की खोज की और इसी के साथ जहाँ मैक्सवेल ने विद्युतचुम्बकीय विकिरणों की भविष्यवाणी अपनी गणना में की थी हर्ट्स ने उनका अस्तित्व सिद्ध कर दिया। फलस्वरूप 1910 तक तो सम्पूर्ण विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम की खोज कर ली गयी थी।
- The British Association for the Advancement of Science(1900) में लॉर्ड केल्विन का एक कथन है जिसमें उन्होंने किसी समय बहुत अज्ञानता पूर्वक कहा था। "भौतिक विज्ञान में खोजने के लिए अब कुछ नया नहीं है, केवल सटीक और सटीक मापन ही बचा है।" (There is nothing new to be discovered in Physics now. All that remains is more and more precise measurement.) लेकिन 20 वीं सदी के शुरू होने से पहले ही Rayleigh-Jeans Ultraviolet catastrophe और माइकलसन-मोरले प्रयोग ने कैल्विन के अज्ञान को मिट्टी में पटक दिया।
अब आगे बढ़ते है :
दरअसल मैक्सवेल की समीकरण की खोज और हर्टज के प्रयोग से पहले प्रकाश की निर्वात में गति के सम्बंध में कई सिद्धांत थे। उनमे से एक सिद्धांत दीप्तिमान ईथर(Luminiferous Aether) का भी था। पहली बात तो यह परिकल्पना 16 -17वी शताब्दी की ही नहीं है। यह प्राचीन ग्रीक परिकल्पना है, ईथर को वह हवा भी कहा जाता था जिसमें देवता श्वास लेते है। खैर ईथर का इतिहास कभी और पढ़ेंगे।
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दीप्तिमान ईथर(Luminiferous Aether) की परिकल्पना संक्षिप्त में कुछ ऐसी है :
- ध्वनि एक मैकेनिकल तरंग है और मैकेनिकल तरंग को एक बिन्दु A से बिन्दु B तक जाने के लिए एक माध्यम की आवश्यकता है। मैक्सवेल की समीकरणों से पता लगा कि -
- प्रकाश एक विद्युत चुंबकीय तरंग है और वह नियत वेग से चलायमान है।
- तरंग को संचरित होने के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है।
- निर्वात में किसी प्रकार का माध्यम नहीं है अतः प्रकाश निश्चित ही एक विशेष माध्यम में चलता है।
- संचरण के लिए प्रयुक्त इस परिकल्पित माध्यम को वैज्ञानिको ने ईथर कहा और ईथर की कुछ विशेषताएं भी लिखी गई।
- जिस प्रकार ध्वनि तरंगे वायु में विक्षोभ(Disturbance) उत्पन्न करके प्रसारित होती हैं उसी प्रकार प्रकाश तरंगे इधर में विक्षोभ उत्पन्न करती हैं।
उपरोक्त आधार पर :-
- ईथर का कोई द्रव्यमान नहीं है अतः वह भारहीन है।
- ईथर पारदर्शी है और इसे देखा नहीं जा सकता वह अदृश्य है।
- ईथर आकाशीय पिंडों की गति का विरोध नहीं करता है वह अप्रतिरोधी है।
- सभी पिंड ईथर में गति करते हैं वह स्थिर है।
- ईथर संपूर्ण अंतरिक्ष में व्याप्त है प्रत्येक द्रव और खाली स्थान में मौजूद है अर्थात ईथर सर्वव्यापी है। ईथर यूनिवर्सल(Universal) है।
Aether have No Viscosity ,Non-Dispersive, Completely Transparent, Incompressible, Continuous at very small scale.
(देखिये ! लगता है ना ईथर डार्क मैटर जैसा जादुई और करिश्माई सिद्धांत ?)
ईथर की परिकल्पना मुख्यतौर पर दो भागों में समझी जा सकती है-
1.) गतिशील पिंड अपने साथ ईथर को घसीटते हैं। ईथर और पिंड के मध्य कोई सापेक्ष गति नहीं होती है। इससे गतिशील पिंड के सापेक्ष प्रकाश के वेग में परिवर्तन नहीं होगा है।
2.) यदि ईथर एक स्थिर माध्यम है और पिंड उसमे गति करते है तब गतिशील पिंड अपने साथ ईथर को नहीं घसीटते हैं। इसके परिणाम स्वरूप पिंड और निरपेक्ष ईथर के मध्य सापेक्ष गति होती है। पिंड की सापेक्ष गति प्रकाश के वेग में परिवर्तन कर देती है।
जॉर्ज गैब्रियाल स्टॉक्स इस ईधर ड्रैग सिद्धांत के चैंपियन कहे जाते थे।
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लेकिन यह सब परिकल्पनाओं के बावजूद ईधर सिद्धांत निम्न बातें नहीं समझा पाया था।
प्रकाश की नियत गति प्रकाश स्त्रोत या पर्यवेक्षक (Observer) के Orientation से अप्रभावित क्यों रहती है ? यदि ईथर है और वह साथ में घसीटा जाता है चाहे ज्यादा या फिर कम तो निश्चित ही ईथर के विपरीत प्रकाश धीमे और उसकी दिशा के साथ प्रकाश का वेग भी तीव्र होना चाहिए ? चाहे यह प्रभाव बहुत सूक्ष्म ही क्यों ना हो इसका मापन भी किया जा सकता है।
इसी बेहद सूक्ष्म मापन के लिये 1881 में माइकलसन ने एक उपकरण का डिज़ाइन किया ओर जिसको इंटरफेरोमीटर कहा जाता है।
माइकलसन के प्रयोग सिद्धांत सिद्धांत ईथर ड्रैग की ईथर WIND पर आधारित था।
- सोचिये आप कार में बैठकर जा रहे है और कार की गति 60 km/h है। अब आप जैसे ही अपना हाथ कार से बाहर निकालते है वातावरण की वायु से आपका हाथ प्रतिरोध उत्पन्न करता है। बाहर कोई हवा नहीं चल रही है ये तो आप है जो हवा में से इतनी तेजी से गुजर रहे है। अब सोचिये ईथर भी ऐसे ही सर्वत्र फैला हुआ है । अगर ऐसा उपकरण लिया जाये जो ईथर में से प्रकाश की नियत गति के कुछ भाग जितनी तेजी से भी गुजरे तो ईथर से उपकरण का प्रतिरोध मापन कर ईथर का अस्तित्व सिद्ध किया जा सकता है।
लेकिन 1880 के दशक में ऐसा उपकरण बनाया कैसे जावे ? यह तो इंजीनियरिंग की समस्या है। फ़िक्र कैसी ! क्यों न कार की जगह पृथ्वी को दे दी जाये और हाथ की जगह उपकरण को ?
मान लो पृथ्वी का कक्षीय वेग V है और पृथ्वी की कक्षा एक लगभग वृत्त है( मान लो), तब त्रिज्या हुई R मतलब 9,30,00,000 मील मतलब R = 1.5×10^8 km
एक साल में दिन हुए 365 और एक दिन में होते है 24 घंटे और एक घंटे में 60 second हुए तो 365 दिन = T = 3×10^7= 315,36,000
पृथ्वी द्वारा तय की गई दूरी वृत्त की परिधि = 2πR
कक्षीय वेग = दूरी/समय
= (2πR)/T
= 30 km/sec
- पृथ्वी सूर्य के चारो ओर 30 km/sec के वेग से घूम रही है। सूर्य स्वयं आकाशगंगा के केंद्र के चारों इस वेग से कई गुना तेज 230 km/sec के वेग से घूम रहा है। क्यूंकि हर चीज इतनी तेज गति से घूम रही है तो इस बात की सूक्ष्म संभावना है ईथर का प्रवाह पृथ्वी पर ईथर विंड की उत्पत्ति करेगा। यह सम्भव है कि प्रभावी विंड की दिशा और गति समान हो पर ऐसा हमेशा तो ऐसा होगा नहीं।
- पृथ्वी की सतह पर किसी बिन्दु पर ईथर Wind की दिशा और परिमाण में भिन्नता होगी ही और बस उस भिन्नता को अगर माप लिया जाए तो ईथर का अस्तित्व सिद्ध हो जाएगा। यह परिमाण बहुत कम होगा क्यूंकि प्रकाश की गति और कक्षा में पृथ्वी का वेग प्रकाश की गति के 1% का भी 100 वाँ भाग है।
इस बहुत सूक्ष्म परिमाण के मापन के लिए माइकलसन और मोरले ने जिस उपकरण का निर्माण किया उसे ही माइकलसन-मोरले Interferometer Experiment कहते हैं।
इस सटीकता का प्रयोग करने के लिए जिस उपकरण की आवश्यकता थी वह तत्कालीन समय के इंजीनियरिंग के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी। एक उदाहरण से समझिए कि Fizeau Foucault Apparatus भी प्रकाश की गति का मापन 5% की एक्यूरेसी से ही कर सकता था और यह उपकरण किसी भी प्रकार की ईथर विंड मापन के लिए दूर-दूर तक अपर्याप्त उपकरण था।
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एक्सपेरिमेंट(Experiment):
- माइकलसन ने मापन की इस समस्या को सरल करने का प्रयास किया। उन्होंने एकल एकवर्णी सफेद प्रकाश स्त्रोत (Single Monochromatic White Light Source) का उपयोग किया जिसे 45 डिग्री पर झुके एक अर्ध-रजजित दर्पण (Half Silvered Mirror) पर आपतित किया गया। इस मिरर को हम बीम स्प्लिटर(Beam Splitter) प्लेट P कहेंगे।
- स्प्लिटर से निकलकर किरण दो अतिरिक्त किरणों में बंट जाती है। एक किरण पारगमित होकर मिरर M1 होती है और वापस परावर्तित होती है। दूसरी किरण M1 से 90 डिग्री पर प्लेट P से समान दूरी पर रखे दर्पण M2 से परावर्तित होकर लौटती हैं। पारगम्य तथा परावर्तित होकर यह दोनों किरणें वापस मिलती है और व्यतिकरण फ्रिंज बनाती है।
- इन फ्रिंज का मापन दूरदर्शी (टेलिस्कोप) से किया जाता है। एक प्रतिकारी प्लेट(कंपनसेटरी प्लेट) भी लगाई जाती है ताकि किरणों के मध्य भौतिक दूरी बराबर होने के साथ-साथ उनकी प्रकाशीय दूरी भी बराबर हो जाए। दोनों किरणों द्वारा तय की गई दूरी में अतिसूक्ष्म अंतर को व्यतिकरण फ्रिंज की स्थिति में परिवर्तन के द्वारा तुरंत पकड़ लिया जाता।
यही वह उपकरण है जिसे माइकलसन ने 1981 में बनाया था। उन्होंने कई प्रयोग करके मापन के लिए आंकड़े जुटाए तथा अनुमान लगाया था कि फ्रिंज शिफ्ट 0.04 फ्रिंज होगा पर वह 0.02 फ्रिंज शिफ्ट हुआ। इस आरंभिक प्रयोग से यह तो सिद्ध हो गया कि इस से अधिक और सटीक नियंत्रित उपकरण पर प्रयोग करने से निश्चित ही सार्थक निष्कर्ष निकलेगा।
- अब कहानी में एडवर्ड मोरले एंट्री करते है। मोर्ले के साथ मिलकर माइकलसन ने काफी समय और पैसा लगाकर अपने उपकरण का एक बेहतरीन संस्करण (Version) बनाया था जो more than Enough accuracy के साथ ईथर Wind का मापन कर सकता था।
- इस संस्करण में प्रकाश किरण को बार-बार दर्पणों और प्लेट P के बीच परावर्तित किया जाता जिससे कुल तय दूरी की लंबाई 11 मीटर हो गई। इस लंबाई पर ड्रिफ्ट मान 0.04 फ्रिंज आना ही चाहिए था। एतिहात के तौर बाहरी कारक प्रयोग में Error ना डाल सके संपूर्ण उपकरण को पत्थर की ईमारत के बेसमेंट के अंधेरे में बनाया गया।
- क्योंकि इमारत पत्थर की थी तो अधिकतर तापीय और कंपन(Thermal and Vibrational) प्रभाव बेअसर हो गए। पूरे उपकरण को बलुआ पत्थर के चबूतरे(खंड) पर बनाकर, फिर इस चबूतरे को पारे से भरी टंकी (Mercury filled Pool) में रखा गया। यह बहुत कलात्मक रूप से बना उत्कृष्ट इंजीनियरिंग का एक नमूना था।
- अब यह उपकरण फ्रिंज में 1/100 वें हिस्से तक बदलाव का मापन कर सकता था। क्योंकि मार्बल ब्लॉक पारे की टंकी में तैर रहा था तो पूरे प्रयोग को किसी भी कोण पर घुमाकर ईथर के बहाव की विपरीत दिशा में भी किया जा सकता था।दिन-रात, मासिक-वार्षिक किसी भी चक्र के हिसाब से डेटा कलेक्ट किया जा सकता था।
- अप्रैल से जुलाई के मध्य वर्षो की इंजीनियरिंग और वैज्ञानिक मेहनत पर कई बार प्रयोग किए गए। व्यतिकरण का जो भी पैटर्न प्राप्त होता उसका और उपकरण का मौसम , दिन और महीनों के मध्य अंतर से कोई लेना देना नहीं होता था। जब तक मिरर के बीच दूरी फिक्स है व्यतिकरण का समान पैटर्न मिलता था। महीनों तक किये गए टेस्ट में उपकरण बार-बार फ़ैल हो रहा था और ईथर के अस्तित्व का कुछ अता-पता नहीं था।
- नवंबर 1887 को "अमेरिकन जर्नल ऑफ साइंस' में "ऑन द रिलेटिव मोशन ऑफ द अर्थ एंड द लुमिनिफेरोउस ईथर("On the Relative Motion of the Earth and the Luminiferous Aether")" शीर्षक से उन्होंने अपना पेपर प्रकाशित करवाया।
- उन्होंने लिखा की मापन में प्राप्त फ्रिंज विस्थापन गणना किए गए विस्थापन का केवल 1 /40 वा भाग ही है। मापित वेग कक्षा में पृथ्वी की गति के अपेक्षित वेग का 1/6 में हिस्सा है और यह गणना में अपेक्षित न्यूनतम 1/4 भाग से भी कम है। जितना वेग मापा गया है वह ईथर के अस्तित्व का एक Poor Evidence है।
माइकलसन को लगा की उपकरण में कोई तकनीकी समस्या है पर उन्होंने पुन: इस प्रयोग में हाथ नहीं डाला वही दूसरी और मोरले संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने इस प्रयोग को मिलर(Dayton Clarence Miller) के साथ मिलकर स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ाया।
नोट: मिलर ईथर सिद्धांत के प्रबल समर्थक थे और कालांतर में अपने विचारों के जड़त्व में उन्होंने आइंस्टीन के सापेक्षिता के विशिष्ट सिद्धांत का मुखर विरोध किया था।
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- मिलर ने 11 की जगह 32 मीटर आर्म लंबाई के मिरर के बीच प्रयोग दोहराया। दीवारों से ईथर ना रुक जाए तो उन्होंने कैनवस के तंबू में अपना प्रयोग बड़े उपकरण पर दोहराया। मिलर को कुछ पॉजिटिव रिजल्ट भी मिले पर विज्ञान व्यक्तिगत प्रयोगो का समूह नहीं है। लोरेंज, माइकलसन और 1930 के दशक अंत तक कोई अन्य वैज्ञानिक मिलर के प्रयोगों के रिजल्ट को Replicate नहीं कर पाया। अंत में इसे Experimental Error मानकर निरस्त कर दिया गया।
- ईथर सिद्धांत के समर्थक टोली से लेकर अन्य वैज्ञानिक सिद्धांतो के समर्थको ने भी लंबे समय तक माइकलसन-मोरले प्रयोग को उधेड़ना जारी रखा। कई व्याख्या दी गई,अनेक एक्सपेरिमेंट किए गए पर प्रयोग अडिग खड़ा रहा।
- माइकलसन-मोरले द्वारा 1887 में क्लीवलैंड में किए गए प्रयोग में निकले "शून्य परिणाम (Null Result) के बाद 1902 से 1904 तक मिलर और मोरले ने लगभग 3 गुना बड़ी मिरर दूरी पर प्रयोग दोहराया पर परिणाम 'शून्य' निकला। अब तो मोरले ने भी कदम पीछे खींच लिये। 1905 में जर्मनी के 26 साल के पेटेंट ऑफिस क्लर्क ने "सापेक्षिता का विशिष्ट सिद्धांत" नाम से एक के बाद एक 3 शोधपत्र प्रकाशित किया।
पहले माइकलसन-मोरले प्रयोग और Rayleigh-Jeans Ultraviolet Catastrophe और अब न्यूटन की ग्रेविटी थ्योरी पर इतना बड़ा प्रश्न लगा दिया गया। मैं सोचता हूं कि बुढ़ापे में लार्ड कैल्विन ने अपने वक्तव्य पर अफ़सोस तो बड़ा किया होगा।
- लेकिन मिलर ने अभी तक हार नहीं मानी थी। 1921 में उन्होंने माउंट विल्सन वेधशाला में पुनः प्रयोग दोहराया और अस्पष्ट नतीजे मिले। फिर 1923-1924 में वह वापस क्लीवलैंड आए और इस बार भी शून्य निष्कर्ष थे। 1924 में उसी समय जर्मनी में रुडोल्फ कार्ल एंटन टोमाशेक(Tomaschek) ने भी प्रयोग किया और शून्य निष्कर्ष प्राप्त हुए।
- 1930 तक विभिन्न वैज्ञानिकों ने ईथर के वजूद की पुष्टि के लिए रुक-रुककर कई बार प्रयोग दोहराये। इस समय तक क्वांटम फिजिक्स का फार्मूलेशन हो चुका था। 1911 की पहली सोल्वे कॉन्फ्रेंस में जब Quanta सिद्धांत से ईथर सिद्धांत को निगला था उसको 24 से 29 अक्टूबर 1927 को प्रख्यात पांचवी सोल्वे कॉन्फ्रेंस में उगल दिया और वही हैंड्रिक लोरेंत्ज़ की अध्यक्षता में उसकी कब्र खोदकर उसको दफना दिया गया।
- अंतिम महत्वपूर्ण प्रयोग गुस्ताव हैमर(Gustaf Wilhelm Hammer) द्वारा 1935 में किया गया जिसे हैमर एक्सपेरिमेंट कहा जाता है। इसमें भी नल रिजल्ट अर्थात शून्य परिणाम प्राप्त होते ही सापेक्षता का विशिष्ट सिद्धांत सिद्ध हो गया और ईथर सिद्धांत प्राचीन काल की बात हो गया।
माइकलसन-मोरले प्रयोग प्रायोगिक विज्ञान के इतिहास का सबसे सफल असफल प्रयोग कहा जाता है।
One of the most successful unsuccessful experiments in the history of Physics.
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M.DINESH
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संदर्भग्रथ सूची:(For People with degree in Physics/Math/Engineering)
Book :
- A Very Brief History of Light by M. Suhail Zubairy | Springer Publication : Chapter 1 Page 3-17
- Mathematical Physics by Dr. M.P. Saxena, Dr. S.S. Rawat, Dr. P.R. Singh | CBH Publication Chapter 4, Page 144-149
- Time travel and Warp Drive by Allen Everett and Thomas Roman | University of Chicago Press(Chicago and London) : Chapter 3 Page 25-30
Others:
- Case Western Reserve University: Encyclopedia of Cleveland History - MICHELSON-MORLEY EXPERIMENT | Encyclopedia of Cleveland History | Case Western Reserve University
- The chemistry information portal from laboratory to process "Michelson Morley Experiment Michelson-Morley experiment
- Aether as a Superfluid : E.C.G. Sudarshan ("Sir C. V. Raman Distinguished Visiting Professor University of Madras") https://inis.iaea.org/collection/NCLCollectionStore/_Public/04/090/4090359.pdf
- Gocho Sharlanov "Michelson-Morley experiment -the factual analysis: January 2020: ResearchGate




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