भारत के चन्द्रयान -3 मिशन पर उठते प्रश्न समाज में वैज्ञानिक शिक्षा और स्वभाव का आभाव है।


इस तरह के प्रश्न हमेशा ही उठते है की क्यों भारत जैसे विकाशील देश को इतने एडवांस स्पेस प्रोग्राम की जरुरत है? जब भी इसरो ने कोई स्पेस मिशन लांच किया है तब ही ऐसे प्रश्न आने लगते है, जैसे मंगल पर क्यों जाना है? चाँद पर क्यों जाना है? मानव मिशन क्यों भेजना है? सूर्य के अध्ययन का मिशन क्यों भेजना है? इतना पैसा यहाँ क्यों लगाया जा रहा है? इस पैसे का उपयोग गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, चिकित्सा इत्यादि में क्यों नहीं किया जा रहा है? 

इस प्रकार के प्रश्नों को सुनकर गरम होने की बजाय या किसी को मूर्ख सिद्ध करने की बजाय बहुगण यह नहीं सोचते है की यह कितना सरल और मौलिक प्रश्न है और ऐसे प्रश्नो का उठना एकदम उचित है। 

सर्वप्रथम आप यह समझ लेवे की इस प्रकार के प्रश्न "अंतरिक्ष कार्यक्रमों और सामाजिक कल्याण के बीच एक विकासशील देश होने के नाते सीमित संसाधनों के आवंटन और हमारी एक राष्ट्र के रूप में प्राथमिकताओं पर आधारित होते है। " 

यह प्रश्न मूलत: प्रश्नकर्ता के STEM शिक्षा और वैज्ञानिक अन्वेषण, अंतरिक्ष अन्वेषण और उसकी प्रौद्योगिकी के विकास और अभियांत्रिकी तथा इस क्षेत्र में सीधे निवेश से अन्य क्षेत्रों में विकास के बारे में जानकारी का अभाव और अधिकतर मामलों में सीधा सीधा प्रश्नकर्ता के अज्ञान को सूचित करता है।  

इसीलिए मैं समझता हूँ की सही सूचना और तथ्यात्मक जानकारी के द्वारा इस अज्ञान को दूर किया जाना आवश्यक है और ऐसे प्रश्नों को नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। क्योंकि हर स्पेस मिशन के बाद और पहले इस तरह के शैशव तर्कों को सुनकर मैं भी ऊब चुका हूँ।  

------------------------------------

पाठक को यह बात समझ लेनी चाहिए की कोई भी वैज्ञानिक सिद्धांत या खोज आपसे सीधा संबंध नहीं रखती है।  

जब अल्बर्ट आइंस्टीन ने पहली बार 1917 के अपने शोध पत्र में उत्तेजित उत्सर्जन(stimulated emission) की संभावना पर लिखा तब उन्हें भी नहीं पता था की लेज़र का अविष्कार भविष्य में कितना प्रभावी रहेगा और एक दिन लेज़र रोबोटिक आर्म्स धातु (Metal) काटने और वेल्ड करने से, सर्किट बनाने, बॉर कोड और पढ़ने से लेकर गाइडेड मिसाइल तक में काम आयेगी।  

जब दुनिया का पहला ट्रांजिस्टर बना तब सामान्य व्यक्ति के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा? लेकिन इंजीनियरिंग का उपयोग करके रेडियो से लेकर डायोड लेज़र और जिस उपकरण (डिवाइस) पर आप यह पढ़ रहे है सभी कुछ हमारे चारों तरफ ट्रांजिस्टर से ही संभव हो पाया है। आपके पुराने डीवीडी प्लेयर से लेकर आपके बच्चे के हाथ में खिलौना लेज़र पॉइंटर यह सब सिद्धांत से शुरू हुई और इंजीनियरिंग द्वारा साकार की गई तकनीक है जिसको उचित निवेश और बाजार प्रतिस्पर्धा ने आप तक उचित मूल्य की वस्तु के रूप में पहुंचाया है।         

मैंने केवल लेसर का उदाहरण दिया पर इस प्रकार में आपको सैकड़ो सैकड़ो उदाहरण दे सकता हूँ जहाँ पर आप कोई भी भौतिकी का सिद्धांत लेवें और उस क्षेत्र में  इंजीनियरिंग और निवेश ने कैसे हमारा जीवन सरल बना दिया है। इसी प्रकार आप यह भी समझे की बिना स्पेस प्रोग्राम के कारण मानव सभ्यता ने जो विगत 60 वर्षो में अनेकों महत्वपूर्ण और मूलभूत तकनीक़ो का अविष्कार किया है उनमें से कई टेक्नोलॉजी शायद अभी तक भी सामान्य जन के लिए उपलब्ध भी नहीं होती।

------------------------------------

एक नहीं मैं आपको ऐसे कई उदाहरण दे सकता हूँ जहाँ जिस तकनीक का उपयोग आप कर रहे है या कर चुके है उसका मूल अविष्कार या उसका मौजूदा संवर्धित संस्करण में उसको लाने के लिये केवल स्पेस मिशन का कितना बड़ा योगदान था। 

डिजिटल थर्मामीटर, कृत्रिम अंग, एडजस्टेबल टेम्पुर-पेडिक गद्दे जो स्पेस मिशन के लिए बनाई गई मेमोरी फोम तकनीक पर आधारित है, बेबी फार्मूला का संवर्धन(Enrichment), Freeze-Dried Food, स्मोक डिटेक्टर, फोम इंसुलेशन की विधि, जल प्रतिरोधी कपड़े(वॉटर Resistant फैब्रिक), Fire-Resistant Materials, High-Energy Nutritional Bars, बेबी इनक्यूबेटर, वायरलेस मेडिकल मॉनिटरिंग (अपोलो 14 के समय एलन शेपर्ड को मॉनिटर करने के लिए अस्तित्व में आई थी।), लघु इंसुलिन पंप तकनीक, Radiation Protection और Air Purification System, Satellite टेलीविजन, हैंडहेल्ड कॉर्डलेस ड्रिल, वर्चुअल रियलिटी और ऐसे ही 100 अन्य अविष्कार जिनकी तकनीक और इंजीनियरिंग को और ज्यादा सटीक, लघु और मिशन स्पेसिफिक बनाने में स्पेस प्रोजेक्ट्स का बहुत योगदान रहा है और आगे जाकर ये कमर्शियल मार्किट में उपलब्ध हुई।  

यहाँ यह भी स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि सभी तकनीकों का सीधे तौर पर आविष्कार या विकास केवल अंतरिक्ष अभियानों के कारण नहीं हुआ है लेकिन स्पेस मिशन में स्पेसिफिक ऑब्जेक्टिव टेक्नोलॉजी के विकास ने फ़्लैश मैमोरी से लेकर मिनिएचर कैमरा, Cochlear Implants, Automated External Defibrillator(AED) से लेकर MRI, CT स्कैनर, मौसम रडार, ट्रैफिक मनेजमेंट सिस्टम, ग्लोबल कम्यूनिकेशन नेटवर्क और Precision एग्रीकल्चर को सीधा-सीधा विकसित किया है।    

प्रौद्योगिकी को आगे बढ़ाने  Multi-Dimension देने के लिए स्पेस मिशन से अच्छे उत्प्रेरक(Catalyst) बहुत कम है।

कोई आविष्कार या उसका सिद्धांत स्पेस मिशन से पहले मौजूद हो सकती हैं लेकिन अंतरिक्ष एक चुनौतीपूर्ण और खतरनाक मोर्चा है। इस वातावरण की अपनी विशिष्ट डिमांड है और यहाँ पर हम सीधा उस तकनीक को काम में नहीं ले सकते है जो हम हमारे ग्रह पर काम में ले रहे है। मौजूदा तकनीक और इंजीनियरिंग का लघुकरण( miniaturization) करके विश्वसनीय(reliable), एनर्जी Efficient डिवाइस बनाने का काम अपने आप में बहुत बड़ी चुनौती है। ये सुधार करने से ही आज हम इन तकनीकों और डिवाइस को ने उपभोक्ता के रूप में दैनिक या चिकित्सा और इंडस्ट्री में काम में ले रहे है।

इस क्षेत्र में प्रारंभिक निवेश और पूंजीवादी बाजार प्रतिस्पर्धा ने आज हमको सस्ते दामों पर ऐसे पॉवरफुल कम्यूटिंग उपकरण उपलब्ध करवाये है जिनका 50 साल पहले अस्तित्व भी नहीं था और जो तकनीक उपलब्ध थी वह भारी, धीमी और केवल मिलिट्री, अंतरिक्ष संस्थानों और बड़े एक्सपेरिमेंटल रूप में यूनिवर्सिटी और उद्योगों के पास ही थी।

मुझे लगता है एक पाठक के रूप में आप यह समझिये कि वैज्ञानिक सिद्धांत नियमित शोध कार्य के द्वारा ही इंजीनियरिंग करके वास्तविक धरातल पर उतारे  जाते है और इनकी तकनीक का विकास और संवर्धन बिना नियमित निवेश के संभव नहीं है। तब एक सभ्यता के रूप में यह आवश्यक है की हम लगातार विज्ञान और इंजीनियरिंग में अपने आपको उत्कृष्ट करते रहे। 

-----------------------------------

अब बात करते है की इसरो (ISRO) के ऊपर उठने वाले प्रश्नो की तो देखिए। 

आज किसी भी देश का स्पेस प्रोग्राम उस देश की टेक्नोलॉजी और साइंस में रूचि से ज्यादा उस देश के भविष्य की परिकल्पना दिखाता है।

  • अमेरिका ने स्पुतनिक के लांच के बाद स्पेस रेस घोषित कर दी और JFK ने 10 साल में आदमी को चाँद पर पहुंचाने की बात मंच से बोल दी। उस वक़्त ना आदमी को चाँद पर उतार देने वाली टेक्नोलॉजी अस्तित्व में थी और ना ही विश्व में ऐसा कभी किसी ने सोचा था। लेकिन एक राजनेता के रूप में उन्होंने जो वक्तव्य दिया यह उस समय पूरे अमेरिका की राष्ट्रीय चेतना में करंट की तरह प्रवाहित हो गया था।  
  • सोवियत को नीचा दिखाने के लिए ही सही अमेरिकन प्रोफेसर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और मिलिट्री सब ने मिलकर इस चुनौती को राष्ट्र गौरव का विषय बना दिया था। टीवी प्रसारणों ने अमेरिकन घरो के टीवी भर दिये, अखबारों में लेखों पर लेख प्रकाशित किया जाते रहे और यह सब का प्रभाव यह था की ना सिर्फ अपोलो मिशन की झड़ी लग गई और तकनीक के निर्माण से आगे निकलकर 1961-1972 के बीच 14 अपोलो मिशन करे गये।  
  • ऐतिहासिक अपोलो-11 (16 Jul 1969 – 24 Jul 1969) मिशन जब तीन सदस्यीय दल में एस्ट्रोनॉट श्री नील आर्मस्ट्रोंग , श्रीमान Buzz एल्ड्रिन और माइकल कॉलिंस को लेकर Luna की सतह पर उतरा तब यह मिशन राष्ट्र गौरव से बढ़कर मानवता का मिशन हो गया था।  

अपना पहला कदम रखते ही श्री आर्मस्ट्रोंग ने कहा  "That's one small step for man, one giant leap for mankind." अर्थात ""मनुष्य का यह छोटा कदम , मानव जाति के लिए एक बड़ी छलांग है।"

वह उस क्षण अमेरिका भी कह सकते थे। वह कह सकते थे मैं नील आर्मस्ट्रॉंग हूँ और मैंने चाँद की सतह पर पहला कदम रख दिया है।"

राकेश शर्मा भी कह सकते थे की "मैं विंग कमांडर राकेश शर्मा सोयूज़ T-11 से बोल रहा हूँ और मैडम प्राइम मिनिस्टर यहाँ से भारत छोटा सा दिख रहा है !"

-------------------------------------

इसरो के ऊपर ना सिर्फ व्यवहारिक अपितु प्रतीकात्मक जिम्मेदारियां भी है और उसे अन्य संस्थानों की तुलना में यह दोहरी जिम्मेदारी निभानी ही पड़ेगी। 

व्यवहारिक जिम्मेदारिया जैसे इसरो के अंतरिक्ष कार्यक्रम राष्ट्र में लांच व्हीकल कैबिलिटी और कैपेसिटी बढ़ाने की तकनीकी का निर्माण करने, एडवांस इंजन और Propulsion की इंजीनियरिंग करने, एडवांस इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी में विद्यार्थियों को प्रशिक्षित करने, देश के सामरिक, भौगोलिक, संचार और आपदा प्रबंधन के लिए ऑबजेक्टिव स्पेसिफिक संचार तकनीक और उपग्रह बनाने, उनको लांच करने और ऑपरेट करने के लिए प्रशिक्षण से लेकर समस्या समाधान करने के लिए इसरो ही जिम्मेदार है। 

इसरो का काम प्रतीकात्मक इस प्रकार से भी है की टेक्नोलॉजी हस्तानांतरण के लिये हमको किसी देश के ऊपर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। भारतीय मस्तिष्क का सामर्थ्य किसी से कम नहीं अपितु कुछ क्षेत्रों में तो विशिष्ट ही है।  

यह राष्ट्र गौरव का विषय हो सकता था जब HAL ने 60 के दशक में मारुत लाइट कॉम्बेट एयरक्राफ्ट बनाया था।  लेकिन राजनैतिक मार्गदर्शकहीनता, सेना, नौकरशाही तथा वैज्ञानिको इंजीनियरो के बीच तालमेल नहीं बैठ पाने के कारण भारत की एयरक्राफ्ट और इंजन निर्माण इंडस्ट्री 2 दशकों में ही तले में बैठ गई। यही विनाश लंबे समय तक सीआईए ने भारत के इसरो और क्रायोजेनिक इंजन निर्माण, परमाणु कार्यक्रम और रिएक्टर प्रोग्राम और मिलिट्री कम्युनिकेशन उपग्रह प्रोग्राम का भी किया।   

इसरो के प्रत्येक सफल प्रोग्राम भारत में भावी वैज्ञानिकों और इंजीनियरो की वही मजबूत नींव तैयार कर रहे है जो किसी समय अमेरिका में नासा के अपोलो मिशन ने तैयार की थी। अपोलो मिशन एक पूरी जनरेशन के लिए उत्प्रेरक थे और अगले 2 दशकों में नासा ने अमेरिका में स्पेस इंडस्ट्री खड़ी कर दी थी। तकनीक और पेटेंट्स की लंबी लाइन और स्पेस रेस की देन है "सिलिकॉन वैली" 

ठीक वैसे जैसे भारत का सॉफ्टवेयर बिज़नेस और बढ़ते आईटी सेक्टर के देन रहा भारत का "सिलिकॉन वैली" और अब जब राष्ट्र सेमीकंडक्टर निर्माण इकाइयों के लिए सरकारी और FDI निवेश की और बढ़ रहा है, इलेक्ट्रिकल व्हीकल निर्माण और उद्योगों के लिए केंद्र नीतियां प्रस्तावित कर रह है, Predictable Policies के तहत सरकार इन क्षेत्रों में FDI प्रस्तावों को मांग रही है भारत के पास भी निकट भविष्य में ना सिर्फ सॉफ्टवेयर अपितु इलेक्ट्रॉनिक इंटीग्रेटेड सर्किट निर्माण और उत्पादन का खुद का विस्तृत बाजार होगा।    

इसरो ने भारत में स्पेस इंडस्ट्री का नया लेकिन बहुत Promising बाजार तैयार कर दिया है। सस्ते और सटीक लेकिन Reliable लांच व्हीकल बनाने में भारत की कई छोटी बड़ी स्टार्टअप लगी हुई है।  हैदराबाद में अग्निकूल कॉसमॉस, स्काईरुट एयरोस्पेस,  KAWA, SatSure जैसे कई बड़े नाम है और इसके अलावा कई अन्य लांच वेहिकल डिज़ाइन में लगी हुई कंपनिया है। 

भारत की स्पेस इंडस्ट्री 4% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर(CAGR) से बढ़ रही है और फ़िलहाल विश्व में 2% मार्केट शेयर के साथ 8 बिलियन डॉलर का कारोबार है।  वही 2040 तक इसी रफ़्तार से यह  100 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है ऐसी संभावनाएं वैश्विक रिपोर्ट्स में जताई गई है। भारत सरकार के अनुसार इसरो ने विगत 9 वर्षो में 389 विदेशी उपग्रह लांच किये है और इससे 3,300 करोड़ रुपये कमाये गए. वही 10 साल में इसरो के कारण स्पेस Economy 123% बढ़ गई है। एक और जहाँ अमेरिका अपनी जीडीपी का 0.28% और रूस 0.15% स्पेस प्रोग्राम पर खर्च करता है वही भारत  का जीडीपी से स्पेस प्रोग्राम पर खर्चा केवल 0.04% है। में किसी अन्य क्षेत्र से तुलना नहीं करना चाहता हूँ की किसमें किसको क्या दिया जा रहा है क्योकि सभी प्रकार के इंसेंटिव और सब्सिडी सरकारी के पब्लिक पॉलिसी फैसले है। 

*******************

  अब इस मुद्दे का एक विशेष प्रश्न जो बार बार उठाया जाता है।  

विकासशील देश में गरीबी और भुखमरी के बीच क्यों भारत स्पेस प्रोग्राम में हजारों करोड़ खर्च कर रहा है? यह पैसा कही और काम आ जायेगा ! 

ये सब बकवास बात है क्योकि किसी भी क्षेत्र का पैसा निकालकर इसरो को फण्ड नहीं किया जा रहा है। भारत सरकार अपने 1000 रुपये के सालाना बजट में से केवल 4 रूपये इसरो को देता है और उससे अपेक्षा करता है की वह अपने शोध कार्य, संसाधनों के उपयोग और रखरखाव , नई मशीने या तकनीक खरीदने और देश भर में फैले अपने 21 सेंटर (14 इसरो केंद्र, 1 IN-SPACe, 2 सीपीएसई और 4 स्वायत्त निकाय) और उनमें काम करने वाले अपने इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, प्रशासनिक कर्मचारियों और सहायक कर्मियों सहित कई लगभग 16,700 से भी ज्यादा के स्टाफ की तनख्वाह , PF और मेडिकल क्लैम्स का ध्यान रखे और विश्वस्तरीय स्पेस प्रोग्राम भी करके दिखाये। 

01 फरवरी 2023 के "The Hindu" का आर्टिकल आप देखिये डिपार्टमेंट ऑफ़ स्पेस को ₹12,500 करोड़ का फंड मिला जो पिछले वर्ष की तुलना में 8% कम है और चंद्रयान 3 और आदित्य एल-1 जैसे मिशन के लिये 2023-24 के केंद्रीय बजट में 32% की कटौती कर दी गई थी। इसके बावजूद इसरो अपना काम बखूबी कर रहा है और आगे भी करता रहेगा।    

भारत अपना बाकि बचा हुआ 996 रुपया कहा लगा रहा है? शिक्षा, कृषि, उद्योग, सेना, इंफ्रास्ट्रक्चर, अन्य subsidies सभी को उनका हिस्सा दिया जाता है।  किसी को 30 रुपया तो किसी को 5 रूपये दिये जा रहा है।

विज्ञान और तकनीक का विकास,  सामाजिक और आर्थिक विकास तथा समाज में तार्किकता, सद्भावना,  शिक्षा, चिकित्सा और धार्मिक सहिष्णुता का विकास समानांतर चलने वाले बहुआयामी विषय है। देश में दंगे हो रहे है आप हाईवे और इमारतों पर पैसा लगा रहे है!  देश में अंधविश्वास फ़ैल रहा है और आप कह रहे है नहीं पहले क्वांटम कंप्यूटर बना लिया जाये! 

सभी अपना अपना काम कर रहे है। देश में उच्च संस्थान है और उनमें से पीएचडी और पोस्ट डॉट करके निकले विद्यार्थी  ISRO, BARC, IISC इत्यादि में नौकरी लेकर अपने विषय रूचि और विशेषज्ञता के अनुरूप प्रयोग, परीक्षण, अध्ययन, प्रशिक्षण और प्रोजेस्ट निष्पादन के कार्य में लगे हुए है। सफल अंतरिक्ष मिशन युवा मन को विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (एसटीईएम) में करियर बनाने के लिए प्रेरित करते हैं।

किसी देश में स्पेस प्रोग्राम, साइंस में इन्वेस्टमेंट ही देश में वैज्ञानिक स्वभाव को बढ़ाने के लिए आवश्यक है और यह भविष्य के वैज्ञानिको और इंजीनियर की पीढ़ी तैयार करने में उत्प्रेरक है। एक अवैज्ञानिक, उदारताहीन, धर्मांध समाज तो निश्चित ही नष्ट होने के निकट आ जाता है। हमारा पडोसी देश इसका उदाहरण है।

******************** 

भारतीय वैज्ञानिक जो आजादी के पूर्व से ही भारत में एक वैज्ञानिक चेतना के संचरण के लिए जी जान से लगे हुए थे। तब भी निश्चित यह कहा गया होगा की ये भौतिकी और रसायन के अध्ययन से क्या होगा देश तो गुलाम है। पर एक और भविष्य था जो विशेष प्रकार  की आँखे देख सकती है जिन्हें हमारे वैज्ञानिकों ने देखा, राष्ट्रनायको ने देखा और खाने को दाने नहीं कोई संसाधन नहीं और ऐसे अभाव में भी वैज्ञानिक संस्थानों और उच्च शैक्षिक संस्थानों को हमने सहेजा और आज उसका परिणाम सामने है।          

समाज का वैज्ञानिक बौद्धिकवर्ग उतना ही आवश्यक है जितना खेती करने वाला किसान या सैनिक, क्योकि जंग नहीं हो रही है तो क्या मिलिट्री बजट कम कर दिया जाये?  क्या सेना के हथियारों की हजारों करोड़ो के खरीद को कठघरे में खड़ा कर दिया जाये?  रक्षा मंत्रालय को इस बार कुल बजट का 13.18% मिला है मतलब बचे हुए 996 रूपये में से 131.8 रूपये और इसरो को कितना मिला ? 

खैर ये तुलनायें नहीं करते है यह सब समय नष्ट करती है। 

-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-

अंतिम भाग इस लेख का यह समझने में लगायेंगे की क्यों यह बात कही जाती है की इसरो नासा के स्पेस प्रोग्राम की नक़ल कर रहा है खुद का कुछ नया क्यों नहीं कर रहा है ?

देखिये ऐसा है अधिकतर ऐसी बातें किसी भीतरी कुंठा से उपजी मूर्खता होती है। यह ठीक ऐसे जैसे कुछ लोगों का coping मैकेनिज्म होता है की "खाने को दाने नहीं और स्पेस मिशन कर रहे है।" जैसी बातें बोलकर बस निकल जाओ।  

वो बच्चे नहीं होते थे स्कूल में जो अध्यापक के कहने पर कि किसी को कुछ पूछना है?  हमेशा कोई प्रश्न पूछते थे जबकि सरल सा टॉपिक और कोई जरुरत नहीं पर उसको तो भई पूछना है की मास्साब ये कैसे हुआ ? ये कैसे किया ? मतलब Asking Question For the sake of asking Question." बस अब ये लत उनको समझदार होने की लग गई की बस बोल दो चाहे जोई बोलो कुछ अलग नजरिया दिखाना है अपना हर बात पर चाहे मूर्खता की पराकाष्ठा पार हो जाये। 

पहली बात तो एडवांस इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी में कोई कॉपी नहीं होती है। लाखों बच्चे मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल और प्रोग्रामिंग के बेसिक्स पढ़ते है और एडवांस पढ़कर डिग्री लेते  है पर सभी अच्छे इंजीनियर या प्रोग्रामर या सर्किट डिज़ाइनर नहीं होते है। जब श्री नम्बी नारायण जी ने रूस से "क्रायोजेनिक इंजन " के Blueprints, इंजीनियरिंग डिज़ाइन मांगे तब वो चाहते थे की अमेरिका की MTCR निति को बाईपास करके देश में ही बिना फॉर्मल टेक्नोलॉजी ट्रांसफर "रिवर्स इंजीनियरिंग" करके क्रायोजेनिक इंजन बना लिया जाये। यहाँ कोई कॉपी पेस्ट नहीं हो रहा था क्योकि फरारी के इंजन डिज़ाइन मिल जाने से मै या आप अपने घर में फरारी या बुगाटी नहीं बना सकते है। उसके लिए बहुत एडवांस इंफ्रास्ट्रक्चर, मशीन और शार्प इंजीनियरिंग माइंड चाहिये। 

दुनिया भर के 50-60 देशो में अच्छे तकनीकी संस्थान है जहाँ पर एयरोस्पेस एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग, एस्ट्रोफिजिक्स और अन्य जटिल वैज्ञानिक विषयों में अच्छी पढाई करवाई जाती है और 195 देशों में कितने ही देशों के खुद के स्पेस प्रोग्राम है पर दुनिया में बस 16 देशों के पास लॉन्च Capability है।

क्योकि फ्यूल मटेरियल सिंथसिस , डेवलपमेंट और Composition, Thrust डाटा , टेलीमेट्री डाटा, कंप्यूटिंग पावर, प्रोपलशन लैब, ऑब्जर्वेटरी , राडार Array, लॉन्चिंग-टेस्टिंग Infrastructure, लांच Pad लोकेशन और डेवलपमेंट,इंजन टेक्नोलॉजी, कमांड एंड कण्ट्रोल इन सबको साथ लेकर चलना और निर्धारित समय सीमा और बजट में स्पेस मिशन को करने के लिये अत्यंत प्रशिक्षित अनुभवी स्टाफ चाहिये होता है। सिलिंडर में केरोसिन डालकर बत्ती सुलगा देने का नाम रॉकेट साइंस नहीं है। 

साउंडिंग रॉकेट छोड़ने से लेकर GSLV लांच करने का सफर और अब चाँद के साउथ पोल पर जाने का सफर 59 साल पुराना है और सीखना उससे भी पहले से चल रहा है। प्रत्येक मिशन इसरो को सस्ते, रिलाएबल और लगातार किये जा सकने की तकनीक विकसित करने और देश में प्रशिक्षित और अनुभवी इंजीनियर और वैज्ञानिकों को तैयार करना सिखाते है। अब में आपको आगे जो चरण बता रहा हूँ किसी भी स्पेस एजेंसी को यह स्टेप्स फोलो करने ही पड़ते है और ब्रैकेट में भारतीय सन्दर्भ लिखे है।    


  1. LEO में उपग्रह लांच के लिये लांच वेहिकल बनाना (इसरो का SLV - 3)
  2. लांच वेहिकल से LEO में पेलोड भेजना और स्थापित करना (  Rohini satellite, RS-1 को कक्षा में स्थापित करना)
  3. भारी पेलोड भेजने की क्षमता विकसित करना ( ASLV का विकास )
  4. LEO के अतिरिक्त अन्य ऑर्बिट में उपग्रह स्थापित करने की क्षमता और एक से अधिक स्टेज वाले व्हीकल का निर्माण करना (PSLV और GSLV का विकास )  
  5. क्रायोजेनिक तकनीक के इंजन में आत्मनिर्भर होना (GSLV MK-3 )
  6. प्राकृतिक उपग्रहों की कक्षा में Satellite स्थापित करना ( 2008 का चंद्रयान -1 )      
  7. एक से अधिक पेलोड ले जाने की क्षमता सिद्ध करना (2017 में 104 satellite का लांच)
  8. प्राकृतिक उपग्रह पर उतरना (  चंद्रयान - 3) 
  9. मानव मिशन करना (आगामी गगनयान )
  10. सूर्य का अध्ययन करना (आगामी आदित्य L1 मिशन) 
  11. सौरमंडल के अध्ययन के लिए मिशन भेजना (आगामी )

सोचिये यही इसरो को कही एक या दो वर्ष 1000 में से 50 रुपये दे दिये जाये तो क्या होगा?

*******************

प्रत्येक मिशन अपने आप में एक चुनौती है और प्रत्येक सफल मिशन अगले के लिए रास्ते खोलता है क्योकि यह एक रैखिक विकास है और बिना पिछले मिशन के अगले पर जाना या जल्दबाजी करने से संसाधनों, समय और उत्साह से हाथ धोना पड़ता है। किसी देश द्वारा वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्र में निवेश करने, नीतियाँ बनाने और परियोजनाएं स्थापित करने से ही सर्वांगीण विकास का ध्येय पूर्ण होता है।

प्रौद्योगिकी और सामाजिक विकास साथ-साथ चलते हैं। आप किसी एक को पीछे धक्का नहीं दे सकते है। मुझे माननीय प्रधानमंत्री जी का चंद्रयान -3 की लैंडिंग के बाद दिया गया वक्तव्य बहुत अच्छा लगा और सभी को एक बार जरूर सुनना चाहिए। स्पेस मिशन मानवता के मिशन है और एक नई स्पेस रेस शुरू करने के लिए इसरो का आभार धन्यवाद।  

-m.Dinesh      

Dinesh Mandora All rights reserved ©

-----------------------------------------------------------------

( This article is not for copying. It is prohibited to use the above text anywhere else without the permission of the author.)


Comments

  1. बहुत अच्छा लिखा है।। लोग दूरदर्शी सोच ना रखने के कारण भविष्य को समझ नही पाते है। जब एयरोप्लेन की बात कही गई तब भी रॉकेट बंधुओ को मूर्ख समझा गया। पर परिणाम हमारे प्रत्यक्ष है। लेखक पहले ही बता चुके है की ऐसे अनेकों उदाहरण है। जनता को समझना होगा, की चिकित्सा, शिक्षा की तरह ही ऐसे मिशन भी आवश्यक है।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

Same Ship Theseus

इतिहास से सीखा ?

My Logic is Undeniable