आध्यात्म और विज्ञान का विवाद जबरदस्ती का विवाद है।

आध्यात्म और विज्ञान का विवाद जबरदस्ती का विवाद है। मैं तो इसको कोई डिबेट भी नहीं मानता हूँ।

आध्यात्म व्यक्तिगत है आपको परमतत्व में मिलना है, परम तत्व से जुड़ना है, कुण्डलिनी जगानी है ये सब फैंसी शब्दों में से क्या चाहिए यह आपका व्यक्तिगत चुनाव है। आपका ये परालौकिक अनुभव केवल आपका है और अगर बुद्ध सही है तो सबको अपना रास्ता खुद खोजना है। जैसा की ओशो कहते है "मेरे निकट बैठने से तुममें भी रस की कुछ बूंदे प्रकट होगी। तुममें आनंद तो आयेगा पर वह क्षणिक होगा। अमृत तुम में भी फूटे इसके लिये तुम्हे ही प्रयास करना होगा।"

विज्ञान व्यक्तिगत नहीं है यह सार्वत्रिक है। नियतांक सार्वत्रिक है, प्रकाश का वेग सार्वत्रिक है, नियम भी सार्वत्रिक है और समान समय पर सापेक्षिक भी है। कठिन गणित और भौतिकी प्रकृति के नियम और उसकी कार्यविधि समझने का तरीका है। प्रकृति इसी भाषा में बात करती है। यह कठिन भाषा है यह अवकल समीकरणों , कंप्यूटर कोड, उष्मागतिकी और टोपोलॉजी की भाषा है। यह सबको समझ नहीं आती है, आ सकती है पर कौन प्रयास करे? इसीलिए इसको समझने के लिये बहुत कठिन परिश्रम करना पड़ता है।

सीमित खोज नहीं होती है एक बार जब कुछ खोज लिया तो परीक्षण होता है। बहुत कठिन और नियमित परीक्षण से सैकड़ो बार गुजरना होता है। हमेशा प्रायोगिक मानदंड पर खरा उतरना होता है और उसके बाद जब तथ्य, नियम या सिद्धांत स्थापित हो जाये तब भी हमेशा संशय और अचानक परीक्षण के कठघरे में खड़ा रहना होता है। चुनौती कभी भी कही से भी आ सकती है। 100 साल बाद भी।

लेकिन वैज्ञानिक खोज की सीमायें हमेशा मानव कल्याण है। आधुनिक, सरल, बेहतरीन जीवन बनाना जो भौतिक दुःखो कष्टों से मुक्त है। हर वस्तु और सुविधा केवल पल भर दूर है। जीवनसाथी भी बस फ़ोन पर ढूंढ लेते है। मर्ज का इलाज है और इलाज बेचने के लिये लैब में एक अनजान मर्ज भी तैयार है। और कुछ मर्जो का पक्का इलाज नुकसान करवा देगा क्योकि जीवन भर जीवित रहन के लिए दी जाने वाली दवाइयां अरबो का व्यापार करवाती है।

आध्यात्म निजी खोज है और विज्ञान मानवता के इस अनंत बेरहम स्याह ब्रह्मांड में प्रसार और जीवन को फ़ैलाने का उपकरण है।

 




Reality has not to be invented, it has to be discovered it is already there. Hence Science discover and true religion also discover. विज्ञान में विश्वास बिल्कुल बेकार है और धर्म में संदेह बिल्कुल बेकार है। -ओशो


प्रकृति में मिल जाने और वापस जड़ों तक जाने की बातें वो करते है जिनका दूर-दूर तक प्रकृति से कोई लेना देना नहीं है। प्रकृति कोई माँ नहीं एक शिकारी है जो हमेशा आपकी ताक में है की कब आप अपना सुरक्षा कवच गिराओ और कब वो झपट्टा मार कर शरीर से प्राण खींच ले ताकि शरीर काम आ सके वापस उसी मिट्टी में खाद और भोजन की तरह जिससे इसने पोषण खींचा है। पेट भरा हो तो आध्यात्म भी सूझता है और राष्ट्रवाद भी, विधर्मी और छोटी-ओछी जाति नाम की मसखरी भी समाज को आती है। भूखे पेट हो तो घुटने पेट तक आ जाते है और पाचन इतना प्रबल की पत्थर तो क्या मार,गाली, उपहास, अपमान सब पच जाता है। कभी देना आप भी किसी भूखे को गाली ! वो खा लेगा, शायद इसीलिए खा लेते है की भूख मिट जायेगी, पर मूर्ख नहीं जानता ये कि पेट की आग आटे से बुझती है और दुनिया का कोई पानी इस आग को नहीं मिटा सकता क्योकि यही नियम है।

पर फिर भी आप चिंता ना करे। अलग अलग तरह के सामजिक, भौगोलिक और राजनैतिक लेबल लगाकर एक-दूसरे को गरियाते रहे और मॉडर्न टेक्नोलॉजी में एक प्राचीन मस्तिष्क लेकर घूमते रहे। बाकि ऐमज़ॉन प्राइम है ही।

-m.Dinesh      

Dinesh Mandora All rights reserved ©

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