कसम है तुम्हे जो तुमने कभी सीखा !

लड़कियों को Bad Boys पसंद आते है इसका Evolutionary कारण है वो कभी बाद में समझाऊंगा। एक उम्र होती है जब लड़कियों को ये नाफरमान, ढर्रे से अलग हटकर चलने वाले अजीब से कपडे पहले झगड़ालू लड़के पसंद आते है। महिलाओ को एक सेवियर (savior) सिंण्ड्रोम होता है। उन्हें लगता है कि मैं अपने प्रेम और समर्पण से इसको बदल दूंगी। ऐसा हर उम्र की महिला में होता है किसी को ज्यादा और किसी को कम पर होता है। ये सोचती है की अब क्योंकि मैं इसकी अँधेरी जिंदगी मै रोशनी की उजली किरण बनकर आ चुकी हूँ और मेरी सीमाओं से बाहर जाकर भी मैं इसको बदल दूंगी। वो लड़कियां इन Bad Boys पीछे अपना वक़्त, भावनायें और अधिकतर मामलों में अपना जिस्म समेत सर्वस्व न्यौछावर कर देती है। लेकिन क्योकि Bad Boys तो रहा Bad Boy और उसको अब जो चाहिये था वो मिल चुका है तो अब वो इस स्वघोषित रोशनी की किरण को लात मारकर इसको सेल्फ हेट और आइडेंटिटी क्राइसिस के ज्वालामुखी में गिरा देता है। यहाँ सालों तक पड़े रहे के बाद, तपने के बाद और व्यक्तित्व में परिवर्तन के बाद यह लड़की अगर इसने नफरत करना और सभी पुरुषों को एक ही रस्सी से हाँकना नहीं सीखा है तो अब यह एक ही परिपक़्व महिला बन चुकी है। कुछ को एक झटके से समझ नहीं आता है तो उनको एक या दो और लगते है। उसके बाद इस महिला के जीवन में आता है एक पुरुष और तब उस इंसान के साथ बिताये गए प्रत्येक लम्हे से पता लगता है इस औरत को एक लड़के Boy और परिपक्व आदमी के बीच का फर्क, उसको समझ आता है नियमित नौकरी पर जाकर परिवार चलाने वाले व्यक्तिव् के विकास का सफर और तब वह महिला गढ़ती है आकर्षक होने की नई परिभाषा जिसमे बड़े muscle और hairstyle नहीं होती है। 

तब इस सांवले आदमी में उस सुन्दर महिला ने क्या देखा ? ये पूछने वाले कभी नहीं समझ सकते है कि एक महिला एक परिपक़्व पुरुष से क्यों प्रेम करती ही ? क्योकि उसने जान लिया है 40 साल के मानसिक लड़के से कही अधिक समृद्ध और परिपक्व जीवन एक 29 साल के पुरुष के साथ जिया जाना कितना सुखद है। 

और कुछ अभागी महिलाये ऐसी भी होती है जो इस पुरुष को खो देती है क्योकि वो अपने ट्रोमा, अवसाद और डर और सेल्फ disgust से बाहर निकलकर एक स्वस्थ संबंध बनाये रखने में कामयाब नहीं हो पाती है। कुछ पहचान नहीं पाती है और कुछ जान बूझकर खो देती है क्योकि खुद पर विश्वास नहीं है।       

अब ये उपरोक्त वार्तालाप याद रखना।  . . . 

----------------------------------------

मुंबई रेलवे डिवीज़न के 199 टिकट चैकर्स ने अंधेरी रेलवे स्टेशन पर 3 अक्टूबर 2023 को फोर्ट्रेस चैक मतलब किलाबंदी करके यात्रियों के टिकट चैक किये। 2,693 यात्री बिना टिकट पकड़े गए और लगभग 7.14 लाख से भी ज्यादा का चालान जमा किया गया। विगत सोमवार को ऐसा ही फोर्ट्रेस चैक फिर से ठाणे स्टेशन पर किया गया और 3,092 बिना टिकट के यात्रियों से 120 टिकट चैकर्स ने 8.6 लाख रूपये का दंड वसूल किया। 

अब आप ध्यान रखिये की इस भीड़ में दक्षिणपंथी, वामपंथी, नारीवादी, स्त्रीद्वेषी, धार्मिक, नास्तिक से लेकर हर पेशे के शिक्षित, समझदार सरकारी , प्राइवेट और कॉर्पोरेट में काम करने वाले सॉफ्टवेयर डेवलपर से लेकर लेखक, स्कूल अध्यापक और देश का भविष्य देश के विद्यार्थी और उनमे से कई भावी अफसरान सभी मिलेंगे। आपको सब मिलेंगे बस आपको एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक नहीं मिलेगा।

यही गैर जिम्मेदाराना लोग अपने इस स्टंट का बखान अपने मित्रो और परिचितों में इतने जोर शोर से करते है की जैसे जो बंधू टिकट लेकर ट्रेवल कर रहे है यह लोग उनसे कितने ज्यादा साहसी और समझदार है।  इन्होने तो कुछ रूपये बचा लिए पर अब इसका भुगतान टिकट के मूल्य में वृद्धि करके बाकि जनता की जेबो पर पड़ेगा। 

सोचिये नियमित आदतन बिना टिकट यात्रा करने वाले अगर ऐसे लोगो से केवल 10 स्टेशन पर औसतन 5 लाख का नियमित नुकसान होता है तब महीने भर में ही 15 करोड़ का अतिरिक्त भार किसकी जेब पर पड़ेगा ? आपकी ! केवल 10 स्टेशन पर अभी राष्ट्र भर में सोचिये !

----------------------------------

ऐसे सैकड़ो तरह के स्टंट इस देश में रोजाना ही होते है। कभी ट्रैफिक नियम नहीं मानने के और कभी बिना टिकट सफ़र करने से क्योकि छोटे मोटे नियम तोड़कर अपने आप को सरकारी तंत्र और सिस्टम से अलग करके एक छोटा सा बेमानी सा अहसास जो हम करते ना यह स्वतंत्र होने का मिथ्या आभास है। कोई नियम नहीं तोडना चाहता है पर मानने के लिए कोई इंसेंटिव भी तो नहीं है।  केवल जुर्म करने पर सजा के सैकड़ो सैकड़ो प्रावधान पर क्या हम समाज में एक अच्छे नागरिक होने के लिए सरक़ार से या अपने समाज से ही किसी तरह का प्रोत्साहन प्राप्त करते है ?

क्योकि आपको कभी स्कूल में उस शिक्षक ने भी नहीं पढ़ाया ना की जिम्मेदार नागरिक होना ही स्वयं में किसी पुरस्कार से कम नहीं है। अगर आप एक समाज के तौर पर  नियम मानोगे तो आपके ही बीच में से ही निकले अफसर, शिक्षक और लीडर भी किसी तत्व के द्वारा नाफरमानी को लेकर हमेशा ही सख्त रहेंगे। (सैद्धांतिक रूप से तो ऐसा ही होना चाहिए।) पर उस शिक्षक को भी तो नहीं पढ़ाया गया है !  

वह लड़का जिसने कभी अपने पिता को ही हेलमेट लगाकर वाहन चलाते हुए नहीं देखा, जिसके शिक्षक ने उसको पढ़ाया की ज़ेबरा क्रासिंग से पहले वाहन खड़ा करते है और उसी शिक्षक ने बत्ती से आगे स्कूटी रोकी हुई है और जिसने अपने बड़े भाई-बहन को बिना टिकट ही कॉलेज जाते देखा है। उस बालक को आप जिंदगी भर एथिक्स पढ़ा लो तो वो क्या इम्प्लीमेंट करेगा ? वह क्यों इम्प्लीमेंट करेगा जब उसने थ्योरी और प्रैक्टिकल में दो अलग-अलग निष्कर्ष देखे है। उसने नाफरमानी सीखी नहीं है उसको दोहरी मानसिकता और व्यवहार वाले निकटवर्ती लोगों ने ही सधे हुए रूप से नियमित  सिखाई है। क्योकि जिन्हे वो देख रहा है उन्हें भी तो सिविल डिस्कोर्स और सिविल एथिक्स की कोई ट्रेनिंग और ज्ञान नहीं दिया गया।  उन्होंने कभी माँगा ही नहीं तंत्र से अपने जीवन मूल्यों को सुधारने का एक छोटा सा टूल जिसको सिविक एथिक्स कहते है।   

अगर भारतीय इतने ही नाफरमान है तो विदेशो में जाते ही ये सब नियम के पट्ठे कैसे बन जाते है? यहाँ जर्दे से दीवारे रंगीन पोतने वाले दुबई में थूकना तक भूल जाते है।  यहाँ भारत में हॉर्न पर बैठकर घर से निकलने वाले कनाडा की सड़कों पर लेन बदलने से पहले भी इंडिकेटर क्यों देते है? और यहाँ पनवाड़ी तक 20 रूपये का पेट्रोल फूंककर जाने वाले जापान और जर्मनी की सड़कों पर मीलों तक साइकिल क्यों चला रहे होते है ? तुम इंडियन पाकिस्तानी बांग्लादेशी श्रीलंकाई नेपाली सब उल्लू के पट्ठो को अपने देश में  क्या हो जाता है?    

क्योकि वहाँ व्यवस्था से ज्यादा सिविलियन और समाज नियमपोश है? क्या वहां नियम तोड़ने के बाद पुलिस वाले से पहले लोग आपको जज कर लेंगे ? क्या आप वह नियमो के अवहेलना करने के बाद समाज में उपेक्षित महसूस करवा डीओए जाते हो?  क्या आपको उनके सरकारी तंत्र की क्षमताओं पर भारतीय तंत्र की कबिलियत से ज्यादा भरोसा है? क्या आपको विदेश जमीं पर इमेज और आइडेंटिटी क्राइसिस हो जाता है?  क्या आप नियमपोश है पर माहौल के हिसाब से है? क्या आप दोगले है? या आप तिगले है? आप तिगले ही है!          

------------------------------------------

______________________________________

सभी अच्छा होना चाहते है पर अगर ताकत, पद और प्रतिष्ठा केवल बुराई और नियम अवहेलना में है तो क्यों ना उसका भी रस चखा जाये? क्यों ना बिना हेलमेट निकला जाये और पुलिस से बचकर उनकी चौकसी को धता बताते हुए गंतव्य तक पंहुचा जाये ? क्यों ना रात 10 बजे के बाद भी जोर-जोर से DJ बजाया जाये ? कोई आएगा तो तेरा भाई देख लेगा? क्यों ना लिमिट से कई कई गुना ऊपर होकर गाड़ी चलाई जाये ? किसी को समस्या होती है तो मुझे क्या जब मैं जानता हूँ की समस्या मुझे समस्या होती है तो किसी को जानने की कोई इच्छा नहीं है।   

यह सब आपके अवचेतन मन में खुद को अलग कर देने की दबी इच्छा का परिणाम है। इसीलिए हम अपने लोगों के बीच इस सरकारी और सिविल ना फ़रमानी का जोर जोर से गुणगान करते है। हमको तालियां नहीं तो गालिया भी तो नहीं मिलती है। शायद  थोड़ा प्रोत्साहन जरूर  मिल जाता है की यार कमाल कर दिया क्योकि सामने वला भी भी तो यही करना चाहता है। सिविल नाफरमानी !  किसी को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं बस उस स्वतंत्रता की ताकत की एक बूँद चखने के लिए जो हमेशा आपको अपने अंगूठे के नीचे दबा के रखती है।  

क्योकि आपका अपने समाज के नाफ़रमानो से रिश्ता बिलकुल टोक्सिक Bad boys और Young girl वाला रिश्ता है। पर आप इतने मानसिक विमंदित हो की झटके पर झटके लगते आ रहे है और आपका अपने इन Bad boys से Obsession खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है।  यह एक ऐसा जहरीला लगाव लगाया हुआ है इस समाज ने अपने नाफ़रमानो से की उन्हें प्रोत्साहन देते देते पैसा, प्रतिष्ठा से लेकर सत्ता तक पंहुचा देते है। सत्ता जहाँ पहुंचकर ये आपकी भावनायें और वक़्त तो ले ही चुके है आपका जिस्म अर्थात आपकी जान भी अब इनकी बपौती है, और ख़ुशी से लुटा देते है हम अपने आप को इन के छल कपट के और राजनीति के नाम पर फिर चाहें अपने ही लोगो का गला क्यों न रेतना पड़ जाये।  ये टॉक्सिक रिलेशन बचा रहना चाहिए ये Bad boy खुश रहना चाहिए।

तुम कब परिपक्व होकर इस रिश्ते का अंत करोगे? और कब कहोगे की अब बहुत हो गया है एक परिपक्व डेमोक्रेसी (पुरुष ) के लिए एक परिपक्व समाज (महिला) बनने का समय आ गया है।  क्यों न सिविक एथिक्स अपने अंदर क्लये जाते और ऐसे नाफ़रमानो का सामूहिक तिरस्कार किया जाये।  क्यों ना बस एक छोटे तबके के रूपप में शुरू किया जाये और इसको आत्मसात करते हुए अपने समाज में फैलाया जाये।  अगर एक शहर सबसे साफ़ शहर बन सकता है तो फिर एक 100 शहर क्यों नहीं ? तो फिर 100 जिले क्यों नहीं और फिर 766 जिलों में कितना वक़्त लगे इस बात से क्या मतलब जब लक्ष्य दिख ही रहा है।  क्यों ना एक दूसरे को सिखाये की ट्रैफिक कैसे काम करता हुआ और हॉर्न पर बैठकर घर से निकलने वालो को वापस  छोड़ा जाये ? क्या हम सीखने के लिये तैयार है? क्या हम किसी से सीख सकते है ? हम क्यों भ्रष्टाचार की बात करते है जब एथिकल रूप से हम सब खुद ही भ्रट है। तो फिर ये नैतिकता की जंग लगी घण्टी गले में लटककर क्यों घूम रहे हो?  सिखाने का इतना जुनून की तुम तो सीखना ही भूल गये !        

इसीलिए मुझे हमेशा हरिशंकर परसाई जी की यह बात चुभती है कि  "हम मानसिक रूप से दोगले नहीं तिगले हैं। संस्कारों से सामन्तवादी हैं, जीवन मूल्य अर्द्ध-पूंजीवादी हैं और बातें समाजवाद की करते हैं।" 

------------------------------------------------------------

m.दिनेश© 

-Dinesh Mandora     

Dinesh Mandora All rights reserved ©

-----------------------------------------------------------------

( This article is not for copying. It is prohibited to use the above text anywhere else without the permission of the author.)

-----------------------------------------------------------------

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

Same Ship Theseus

इतिहास से सीखा ?

My Logic is Undeniable