भारतीय कीचड़ = शिक्षक

ये हैडिंग क्योंकि जिस देश का शिक्षक ही मूर्ख हो तो उस देश की नस्लें तो मूर्ख होगी ही ना! आप पूछिए तो सही किसी भी सरकारी य गैर सरकारी विद्यालय से लेकर कोचिंग तक में पढ़ाने वाले शिक्षकों और व्याखाताओ और कल्ट घोषित गुरुओं से की उन्होंने विगत वर्ष 2023 में ही अपने ज्ञान में वृद्धि करने, इंट्रडिसीप्लिनरी स्टडी में अपना ज्ञान बढ़ाने और अन्य विषयों को तो छोड़ ही दीजिये अपने स्वयं के विषय को साधने के लिए कौन सी महत्वपूर्ण पांच पुस्तक पढ़ी थी? सारा दिन Gullible बच्चों के सामने अपने सीमित नजरिए का ज्ञान देने वाले कूप मड़ूको की कोई मौलिक उपलब्धि वर्ष भर रही है? एक तो अगर तुम ये पढ़ रहे हो हर दूसरी लाइन में तुम्हारे पास कोई निजी अनुभव है की फलाने गुरूजी या मेरे गुरूजी या मैं तो ऐसा नहीं हूँ तो देखो Generalization of masses through exemplifying peculiar or specific Individual के पुरोधा यह लेख भी तुम्हारे लिए नहीं है। समय मत बर्बाद करो कुछ और पढ़ लो जाओ अभी तुम्हारी मानसिक लब्धि इतनी हुई नहीं है ! ये पांच सितंबर को 'गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु' करके सरस्वती के चित्र के सामने दीप प्रज्ज्वलित करने के बाद ये लोग शब्दों से जो अपनी पीठ थपथपाते हैं ना इनका घमंड और गुरुर इस स्तर तक पहुंच चुका है कि यह किसी व्यक्ति द्वारा दो बात सुनने को तैयार नहीं है। 

आप करके देख लीजिए एक सरकारी विद्यालय के अध्यापिका जो दसवीं तक विज्ञान पढ़ रही है उसके सामने जब कोई व्यक्ति किसी विज्ञान की पुस्तक या वैज्ञानिक शब्दावली का प्रयोग कर कोई बात समझाने लगे तो इनका गुरुर इनके नकचड़े मुंह पर दिखने लगता है कि “यह व्यक्ति मुझे क्या बताएगा हम तो पहले से ही गुरुजी हैं।“ सारे दिन चपड़-चपड़ करने वाले इन मास्टरों के मुंह खुला और दिमाग बंद है। 95% उतना जानते हैं जितना इन्होंने पढ़कर परीक्षा पास की है और एक अच्छे भारतीय विद्यार्थी के तरह वह भी यह आने वाले कुछ ही बरसो में भूलने वाले है क्योकि नौकरी मिल ही गई ही अब पढ़ने और सीखने का क्या काम?  वही 50 साल पुराना करिकुलम और उनकी वही 50 साल पुरानी दोयम दर्जे की मानसिकता।

कभी देखा है आपने किन्ही सरकारी शिक्षकों को कोई Healthy डिस्कशन करते हुए ! जहां विषय प्रमुख अपने विषय के ज्ञान के अनुसार धर्म, समाज, विज्ञान और सोशल ऑर्डर, Equality , लिबर्टी और सोशल जस्टिस की बात करते है ? नहीं देखा ना। क्योंकि इनकी बातों और वार्ता का स्तर और उनकी सोचने की क्षमता आपके हतप्रभ कर देगी कि अगर यह लोग भावी पीढ़ी बनाने के लिए कृत संकल्प है, अगर यह वह तबका है जिसको विद्यार्थियों को शिक्षित करके एक "Inclusive Harmonious Collaborative Welfare Society, which is away from any unscientific discourse and Discrimination on the basis of caste, creed, color, religion, and race, and refutes primitive ideas on the basis of such discrimination. It aims to provide a balanced growth of civil society through ecological harmony and coexistence with other species on the planet, intertwined with the Ethical integrity of intellectually developed human beings." बनाने की नैतिक जिम्मेदारी दी गई है ! 

क्योंकि अगर ऐसा है ना तो मैं लिख कर देता हूं “we are Doomed, We are surely Doomed” 

  • जिस देश की सामाजिक विज्ञान, इतिहास, दर्शन और प्राकृतिक विज्ञान तो क्या जीव विज्ञान का शिक्षक जातिवाद, नक्सलवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद और धर्मान्धता और छद्म गोत्रीय गौरव से भरा हुआ है और विद्यार्थी के सरनेम, सोने-उठने-बैठने की आदत, हस्तलेखन और बालों की कटिंग, पेंट और जूते पहनने के तरीको इत्यादि के हिसाब से उसकी काबिलियत का या वह कौनसा विषय ले इस बात का आंकलन कर लेता है उसे देश की नस्ले खराब और दूषित नहीं पैदा होगी तो क्या होगा?
  • भारतीय विश्वविद्यालय किसी राजनीतिक पार्टी के ऑफिस से भी बड़े राजनीति के अड्डे हैं और लगभग हर दूसरा शिक्षक किसी न किसी संगठन से अपना ट्रांसफर रुकवाने या करवाने के लिए जुड़ा हुआ है।  वो एक शिक्षक से ज्यादा अपने पद का उपयोग एक Preacher की तरह करता है। और ये प्रीचर; प्रीच क्या करता है? उपरोक्त सभी।      
इस देश के डाउनफॉल का सबसे बड़ा कारण इस देश का तथाकथित शिक्षक हैं जो एक विद्यार्थी को शिक्षा का अर्थ तक नहीं समझा सकता है! यह क्या किसी बच्चे की करियर काउंसलिंग करेंगे जो खुद केवल शिक्षक इसलिए बने कि यह आरामदायक अधिक वेतन वाली सुरक्षित सरकारी नौकरी है। अंग्रेजी में वह कहावत है ना कि “Those who can’t do Teach” क्योकि भारतीय विद्यालयों चाहे सरकारी हो या प्राइवेट इन सब पर कहावत एकदम सटीक बैठती है।  सारे दिन बच्चों के सामने चपड़-चपड़ करने वाले फिर स्टाफ रूम नाम की गुफा में धर्म, राजनीति और विज्ञान पर घटिया से घटिया चाय की थड़ी के स्तर वाले वाले कुतर्क एक-दूसरे को प्रस्तुत करने के बाद यह अपने आप को इतना बड़ा ज्ञान पुंज समझते हैं कि किसी को एक मिनट सुन नहीं सकते है।  बच्चों से ज्ञान की चर्चा करने वाले और जिन्हे खुद ज्ञान और knowledge में बीच फर्क समझ नहीं आता है!  इन जड़बुद्धियो से फेक्चुअल और साइंटिफिक बेसिस पर कोई बात कर लो तो इनका ऐसे मुंह बन जाता है कि “यह हमको क्यों समझा रहा है?” जाल जो ये लोग अपने सामने किसी को बोलने भी दे। इनकी तोप छोटी नहीं पढ़नी चाहिए।

जो स्वयं नहीं सीख सकता है वह क्या ही सिखाएगा? जो स्वयं अज्ञानी है जिसे विगत वर्ष की 10 बड़ी किताबों का ज्ञान नहीं है, जिसके घर में कॉम्पिटिशन एग्जाम के अलावा पांच अच्छी किताबें नहीं और जिसने इंट्रडिसीप्लिनरी स्टडी जैसा शब्द नहीं सुना वह क्या सोचने समझने और एज आफ क्वांटम कंप्यूटिंग में स्किल डेवलप करने वाली पीढ़ी का निर्माण करेगा?

कॉलेज के हालात खास तौर पर विज्ञान के कॉलेज के हालात इतने बुरे हैं कि एमएससी फाइनल ईयर फिजिक्स वाला बच्चा यह नहीं बता सकता की धरती गोल है, चपटी नहीं है इसको वैज्ञानिक रूप से कैसे सिद्ध करेंगे? पता है ऐसा क्यों क्योंकि उसे प्रोफेसर को भी नहीं पता यह तो “आउट ऑफ सिलेबस” आ गया है। दर्शनशास्त्र का शिक्षक खुद Tautological fallacy के तर्क देता है Tautological argument करता है। वो दर्शन नहीं पढ़ाता है बस Strawman और GOD of The Gap के कुतर्क देकर अपने किसी आदिम भगवान् का अस्तित्व सिद्ध करना चाहता है! आधो को तो दर्शन और Philosophy में फर्क ही नहीं पता है। इतिहास का अध्यापक को इतिहास का ज्ञान यूट्यूब रील से आ रहा है और सोशियोलॉजी का अध्यापक इंक्लूसिव सोशल स्ट्रक्चर का मतलब नहीं जानता है।

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ये सेल्फ ऑबेस्ड narcissistic खुद की Pseudo superiority में ही मारे गए और तीस सालों में पूरी नस्लें गड्ढे में ले बैठे है। और हां मैं यह बार-बार कहूंगा की जब कुर्सी पर बैठ जाये तो सीखने के मामले में इस देश का बहुसंख्यक ताथकथित शिक्षक वर्ग "Narcissistic, self-obsessed, ignorant, ill-read, ill-informed, poor critic, Influenced opinionated, narrative-driven, herd follower, biased speaker, degree holder, Poor-to-virtually no intellect, mass produced Individual." वाले एक बड़े समूह से ज्यादा कुछ नहीं है।

और इस समूह की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है की विगत 30 वर्षो में हर साल लाखों की संख्या में इन्होने अपने जैसे और बनाये है क्योकि स्कूल इसीलिए ही बने है! Systematic Destruction of Natural gifted human intellect through rigorous process of decade-long emotional and physical violence and suppression by well-articulated poisonous curriculum अर्थात School. 
और अब मैं खुद को कॉन्ट्रडिक्ट करूँगा क्योकि मेजोरिटी के लिए यह स्कूल सिस्टम ही ठीक है क्योकि Intellect is an individual trait, not collective. 

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हालात ये है की 15 सालों से अंग्रेजी पढ़ाने वाले शिक्षक खुद एक Well Structured Continuous Sentence इंग्लिश में लिख नहीं सकते है! Forget they would ever be able to communicate in the same language with anyone. Now imagine William Shakespeare Hamlet or Othello or Macbeth in their household. या फिर किसी इकोनॉमी के टीचर के पास तुमने Hobbs की 'वेल्थ ऑफ़ नेशन' देखी हो? किसी फिजिक्स पढ़ने वाले या वाली के पास कार्ल सेगन की Pale Blue Dot या हाकिंग की Brief Answers to the Big Questions रखी हो ? कितनो को पता है इनमे से की Richard Feynman की ऑटोबायोग्राफी का क्या नाम है? रॉजर Penrose की रिसर्च क्या है और Edward Witten कौन है?    
क्योकि ये कल्ट worshiper है इसीलिए इनके पढ़ाये विद्यार्थी भी वही है ! शिक्षकों के चारो तरफ उनके चेलों ने बड़े-बड़े सोशल मीडिया कल्ट खड़े कर लिए है! कल्ट worship हमारे खून में है और ये कही नहीं जाने वाली, आने वाले 100 सालों तक तो नहीं जाएगी! ध्यापन का कार्य इस स्तर तक गिर चला है की पतित से पतित व्यक्ति नैतिकता का ज्ञान देता है और कमाने के लिये अपनी एथिकल इंटीग्रिटी भी बेच चुका है। कोचिंग माफिया के सरताज पॉडकास्ट पर किसी पांच रूपये की नैतिक शिक्षा वाली किताब से प्रवचन देते है और अभद्रता और भाषा सुनिए कभी इन So called Cult Teachers की इनके बीच होने वाले प्रसिद्ध बीफ़ और बैकलेस पहने 14-15 साल के लड़को को खींचती महिलाये! खेर मैं भी नैतिक शिक्षा का ज्ञान नहीं दूंगा क्योकि Morality मतलब गले की घंटी , हर कोई अपनी दूसरे के गले में बांधना चाहता है।      

इन्हें तो यह भी नहीं पता सरस्वती किसका मेनिफेस्टेशन है ! सरस्वती इस देश के स्कूल-कॉलेजो में नहीं रहती है ठीक वैसे ही जैसे इस देश में भगवान् मंदिरो तीर्थो पर नहीं रहता है! कौन रहे इतना प्रदूषण जो है। तो फिर तुम 1. 5 अरब के संख्या में होने के बाद भी प्रख्यात वैज्ञानिक, दार्शनिक, समाजशास्त्री, गणितज्ञ तुम पैदा कर दो? कैसा ओछा मजाक खुद के साथ करते हो! तुम्हारा इंट्रेस्ट ही यही है इन सब में क्योकि तुम्हारे लिए यह दुनिया वास्तविकता नहीं है ! यह माया है It's a god damn illusion और तुमको बस मरकर स्वर्ग में जाना है तो सारे जतन वह जाने के है चाहे यहाँ तुम कितना ही miserable होकर जियो! 

जो माया में है उनको साफ हवा, पानी, भोजन, चिकित्सा, अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा, न्याय, सोशल आर्डर से कोई लेना देना नहीं है! तो ये सबके बारे में पढ़ाने से मतलब भी क्या रह जाता है?

The only thing they have ever produced is well trained, well literate youth generation after generation devoid of any kind of skill, literate yet uneducated, Poorly Informed yet furiously opinionated, Ignorant yet bluntly critiques, intellectually limited yet limitless verbal because और वो कर भी क्या सकते है? समस्या सुलझाने के लिए समस्या पता भी तो होनी चाहिए! 

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m.दिनेश© 

-Dinesh Mandora     

Dinesh Mandora All rights reserved ©

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Comments

  1. "ज्ञान दर्प" और "पद आसक्ति" प्राचीन समय से भारतीय शिक्षक अनुवांशिकी में हावी है। द्रोण , विश्वामित्र से लेकर विष्णुगुप्त तक सभी में इसके स्पष्ट अंश देखे गए हैं। रही बात आधुनिक समय की, तो यह समय कॉर्पोरेट टीचिंग्स वाला समय है। यहां ज्ञानार्जन नहीं, अपितु "भेड़ कन्वर्जन" पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। जो शिक्षक जितना रोचक, आकर्षक और रसीला बोलेगा, उसे संस्थान उतना पैसों से तोलेगा। इसके लिए सैंकड़ों इंटीलेक्ट कंटेंट पढ़ने या भारी भरकम कॉम्प्लेक्स बुक्स को खोलने की आवश्यकता नहीं समझते, क्योंकि विद्यार्थी वैसे ही विद्या की अर्थी उठा चुके होते हैं। 50 स्टूडेंट्स की कक्षा में मात्र 3 या 4 होंगे जो किसी भी शिक्षक के व्यक्तिगत मतों को फॉलो करता होगा, अन्य तो वैसे भी दुनियां की भीड़ के फ़िल्टर में छन जाने के लिए तैयार बैठे हैं।

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