वैज्ञानिक और दार्शनिक ज्ञान

दार्शनिक ज्ञान किसी भी प्रकार के ज्ञान की पराकाष्ठा है। आप किसी भी विषय का अध्ययन कर लीजिये उस विषय में आपके ज्ञान का उच्चतम स्तर आपको उस विषय के दर्शन की और लेकर जाता है। भौतिक वैज्ञानिक रियलिटी को उसके फंडामेंटल बिल्डिंग ब्लॉक तक समझना चाहते है और गणितज्ञ उसी रियलिटी को कागज पर उतार देना चाहते है। कैमिस्ट और बायोलॉजिस्ट जीवन को उसके एक-एक क्रिया कलापों और को माइक्रोस्कोप के नीचे देख लेना चाहते है वही बॉटनिस्ट दुनिया के हर पुष्प, पादप, fungi को उसका निजी नाम दे देना चाहते है।

इन सब के बाद जब आप उनसे पूछते है की उनके अध्ययन का उद्देश्य क्या है तो बिना दार्शनिक हुए वो अपनी बात समझा ही नहीं सकते है क्योकि उन्होंने प्रकृति को उसके मूल रूप में देखा है। सामान्य आँखो के लिये प्रकृति एक बहुत सरल दिखने वाली सुन्दरता है पर किसी वैज्ञानिक के लिए बहुत काम्प्लेक्स और बैलेंस्ड जैविक तंत्र है जिसके भीतर असंख्य मैक्रो से माइक्रो बायोलॉजिकल मशीनों का एक विशाल इकोसिस्टम काम कर रहा है।

ये जो मैंने कहा है वो बहुत उथली बात है क्योकि दर्शन ऐसा ही विषय है। दर्शन मतलब देखना तो मैं जिस तरह से देखता हूँ यह निश्चित है कि दूसरा वैज्ञानिक उस तरह से नहीं देखता है पर हम इस बात पर सहमत हो सकते है की इस विशालकाय ब्रह्माण्ड के किसी भी मैकेनिज्म को समझने और उसको admire करने के लिए एक जीवन नगण्य है। Microbiologist और Virologist जिस माइक्रोस्कॉपिक दुनिया में रहते उसको admire करने के लिए एक जीवन चाहिए।

जिस दुनिया में Myrmecologist रहता है उस पूरी वैज्ञानिक शाखा को समझने में उतना ही जीवन लगेगा जितना एक Mycologist को वो दुनिया समझने में लगा है। स्टेलर फिजिक्स पढ़ना एयरोस्पेस इंजीनियरिंग पढ़ने से अलग है और ठीक इसी तरह बायोकेमिस्ट्री पढ़ना Botany पढ़ने से अलग है। लेकिन यह समझ लेना की यह सब विषय और दर्शन एक ही ग्रैंड क्लॉक के छोटे बड़े गियर्स का अध्ययन है और हर व्यक्ति अपने तरीके से इस सृष्टि को समझने देखने और जान जाने के लिए अपने बहुत सूक्ष्म विज़न का उपयोग करता है Wisdom है।

इसीलिए इंसान अकेले नहीं एक समूह के रूप में सभ्यता बनते है। समाजशास्त्री, वैज्ञानिक, दर्शनिक, अध्यापक, श्रमिक, किसान, सैनिक और ऐसे हजारो हजारो प्रकार के प्रोफेशन जो मिलकर एक छोटा सी पेंसिल से लेकर विशालकाय ISS अंतरिक्ष स्टेशन का निर्माण कर सकते है। सभ्यताएं जो हजारो सालों से जीवंत रही और नष्ट हो गई और मानव ज्ञान जिसमे हर गुजरते सेकंड में बढ़ोतरी होती जाती है क्योकि हम अरबों है और अरबों क्लिष्ट मानव मस्तिष्क भी इसी ब्रह्माण्ड की एक हिस्सा है। हम आपस में युद्ध भी लड़ते है और साथ में आपदाओं से भी लड़ते है। हम एक दूसरे का विचार और राजनीति के नाम पर निवाला भी छीन लेते है और मानवता के नाम पर हजारो पेट भी भरते है।

कला में अद्भुत विज्ञान है और विज्ञान एक अद्वितीय कला है। गणित प्रकृति की भाषा है और इस भाषा में हवाओं का चलना, पानी का बहना, फूलों का खिलना और तारों फटना, ग्रहण का लगना और जीव का उत्पन्न होना, शेर की दहाड़ और कोयल का गीत, मछली का तैरना और हृदय का संगीत सभी कुछ तो प्रकृति ने code किया हुआ है।
जो इस भाषा को बोलना सीख गया इसको समझना सीख गया वो तो प्रकृति पुत्र है। अगर मैं मान भी लूँ की इस ब्रह्मांड को किसी महान गणितज्ञ की भांति किसी भगवान् ने लिखा है तब भी वैज्ञानिक उस लेखनी को समझने में किसी भी अन्य व्यक्ति से अधिक निकट है।

पर याद रखे उपरोक्त विचार सभी के लिए सही नहीं है क्योकि दर्शन के इस स्तर तक जाने के लिये खुद के एक एक विचार को छांट छाँट का नष्ट करना होगा जो स्वाध्याय से नहीं अपितु सामजिक जीवन से आया है। भारत एक विरला विकृत देश है यहाँ वैज्ञानिक भी धार्मिक होने से मिलने वाले Pros नहीं छोड़ना नहीं चाहता है! बड़ा विरला क्योकि विज्ञान और इंजीनियरिंग में इनका विश्वास है , इसको पढ़ते है अविष्कार भी करते है और विश्व में जाने भी जाते है और विकृत क्योकि उसी तकनीक का उपयोग अपने आप को 1000 साल पीछे लेकऱ जाने के लिए भी करते है। इसपर चर्चा कभी बाद में करेंगे अभी बस इतना ही . . .   

m.दिनेश© 

-Dinesh Mandora     

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