Disintegrating Quora (Hindi)

गालीदूतों की विशेषता यह होती है की यह सामान्य जीवन में नैतिकता के पपीते बड़े चाव से लोगो को खिलाते है। इस ब्रीड की जिंदगी Morality प्रीचिंग पर चलती ही क्योकि इनको एथिक्स की कोई समझ नहीं है। ये धार्मिक नहीं होते है ये डरपोक लोग होते है। इन्होने जीवन में कोई धार्मिक मूल्य आत्मसात नहीं किया होता है ना कुछ अच्छा इन्होने पढ़ा होता है। इनके ज्ञान की अधिकतर ट्रेनिंग जिस Pro पॉलटिकल आइडियोलॉजी विंग या संस्था से जुड़े होते है उसकी बैठक में ही होती है।

पर मैं गालीदूतो की बात क्यों कर रहा हूँ? क्योकि गालीदूतों की खरपतवार से आज सबसे ज्यादा त्रस्त Quora हिन्दी का मंच है और मुझे इस वास्तविकता को देख देख के बड़ा आत्मक्षोभ और आंतरिक क्लेश होता है की जिस मंच से मैंने अपने आप को पहचाना , मैंने लिखना शुरू किया , मुझे इतनी अच्छी कम्यूनिटी मिली। मेरे विज्ञान और भौतिकी के सीमित समझ को मेरी मातृभाषा में लोगो तक पहुंचाने और हिंदी में अनुवाद से लेकर मौलिक लेखन तक को सभी से साझा करने का जो पहला पायदान ट्रोल और गाली बाज निकृष्टो का एक मंच बन गया है। जहाँ बिना थप्पड़ खाने से डर से अधम स्तरीय मनुष्यों ने लगभग सभी विचारधाराओं के मौलिक लेखकों और विचारकों को एक तरह से बंधी बना रखा है। कही ये टुच्चे ट्रोल बर्बरता पूर्वक कमेंट बॉक्स में चीर हरण नहीं कर देवे इसीलिए कई लेखिकायें तो अपने को केवल अपने कंटेंट और कुछ हलकी फुलकी टिप्पणियों तक सीमित कर चुकी है। बहुत सी शायद अब क्वोरा पर कभी कभार आती है और लगभग सभी लेखिकाओं के मैसेज बॉक्स में नराधम जीवों के वाहियाद कमेंट और one लाइनर भरे पड़े है।

वही लेखक चाहे किसी भी विचार को हो इन आधे तो तटस्थता के तारो पर बैठे है कि कही गलत को गलत बोल देने से उनका फॉलोवर सपोर्ट कम ना हो जाये या कही वो इन गालीबाज नफरती चिंटुओं का शिकार ना बन जाये और इनकी चपेट में ना आ जाये।

तो आज आप यह समझ लीजिये की आप को बक्शा नहीं जायेगा जिस दिन आप इनके गिलोटिन(guillotine) के नजदीक आये आपको बालों से खींचकर आपका भी सर कलम कर दिया जायेगा। बाकि के जो लेखक है वो अपना लेखन और विचार प्रचार जारी रखते है और इन गालीबाजों पर ध्यान नहीं देते है।

जिस मंच का होना इस बात का गवाह होना चाहिए था की हिंदी में अच्छा और मौलिक लिखने और पढ़ने वालो की कतई कमी नहीं है। हिंदी में शानदार ज्ञान, विज्ञान , इतिहास, संस्मरण , कविताएँ , कहानी, भूगोल, राजनीति, समाजशास्त्र, दर्शन, भौतिकी , तकनीक ,गणित और अन्य सैकड़ों विषय के हिंदी में लिखे सुव्यवस्थित डिजिटल कंटेंट से इंटरनेट को भर देना चाहिए था और पढ़ने वालो को अपने पसंद के लेखकों, विचारधाराओ, विषयों और रुचियों के बीच चुनने और पढ़ने में कोई समस्या नहीं आनी थी। मुझे यह देखकर हताशा होती है की मैंने 2017 से आज 2024 तक जितना downfall इस मंच का देखा है उसका 80% मेरे नजरिये में विगत 3 वर्षों में हुआ है।

गरिमाविहीन ट्रोल, राजनैतिक गुटबाजी, अश्लील तो छोड़िये सीधा पोर्नोग्राफिक कंटेंट, QPP के पैरासाइट प्रोफाइल और निकृष्ट गालीदूतो ने इस मंच को फेसबुक के बराबर ला खड़ा किया है। क्वोरा की नीतियों के चलते फेक प्रोफाइल और व्यस्क सामग्री, हेट कमेंट, जातिवाद और नस्लभेद तक सामान्य यूजर की फीड में लगातार बिना किसी मॉडरेशन के परोसा जा रहा है। यहाँ तक की ऐसे लोगो को ब्लॉक या म्यूट करने के बाद भी यह सब हमेशा दिखता ही है।

Image Credit :Meta AI for WhatsApp

इन गालीदूतों की कोई मौलिक उपलब्धि ना तो आज तक जीवन में है, ना ही समाज मैं और ना ही कभी इन्होने इस स्तर पर कभी सोचा है। ज्यादातर राजनैतिक ग़ालीदूत स्क्रीन के दूसरी और बैठे non empathetic narcissist, self hater, sexually frustrated, social nuisance, ill read, ill mannered, skinny, vitamin, fear filled, intellectually deprived, mentally abused वो लोग है। इनका मोटिवेशन है केवल विध्वंस क्योकि निर्माण और सृजन करने लायक ऊर्जा और शक्ति इनमे कभी नहीं होती है। यह दूसरों को नीचे दिखाकर ही अपने बारे में श्रेष्ठ महसूस कर सकते है। आप इनसे कभी भी कसीस विषय पर एक मुकि विचार लिखने के लिए कहंगे तो ये नहीं लिख पाएंगे क्योकि इनका ब्रेन ऐसे काम ही नहीं करता है। ये कुछ अच्छा सोचने का भी प्रयास करे तो नहीं कर सकते है क्योकि दिमाग नफरत और स्व-घोषित धार्मिक ठेकेदारी की वजह से पिघल कर इनके नाक, आँख और कानों से कब का बह गया है। इसीलिए इन्हे अब केवल नफरत ही नफरत दिखाई देती है, conspiracy ही सुनाई देती है और यह लोग केवल जहर ही उगल सकते है।

एक पूरा तबका इन ट्रोल्स का और कुछ नहीं डरे हुए गीदड़ों की फ़ौज है जिनमे कभी भी सरकारी तंत्र, सरकारों , अधिकारियों या प्रशासनिक दमन और गलत नीतियों के खिलाफ खड़े तो क्या बोलने की , बोलना तो छोड़िये उनके सामने मिमियाने तक का माद्दा नहीं है। ये केवल झुण्ड बनाकर कभी धर्म के नाम पर किसी का ठेला या दुकान उजाड़ सकते है, किसी को सड़क पर पीट सकते है या कभी किसी को घोड़ी या मंदिर चढ़ने से रोक सकते है। लेकिन इनमे से एक भी अपने गांव के सरपंच या मोहल्ले के पार्षद के विरोध में जाकर यह नहीं कह सत्ता है की भ्र्ष्ट आदमी तुम ने सड़क या पानी की समस्या का समाधान अभी तक क्यों नहीं किया है? यह लोग अगर संवेदना भी दिखाते है तो धर्म और जाति देख कर दिखाते है और अपने निम्नतम स्तर पर यह लोग और कुछ नहीं तो ब्लड बैंक में खून भी अपनी ही जाति या मजहब वाले का मांग ले तो कोई बड़ी बात नहीं है।

भारतीय समाज में एक कोढ़ है और यह आज से नहीं है बहुत पौराणिक कोढ़ है एक बहुत सामान्य सी बीमारी जिसको भारतीयों ने अब लाइलाज बना लिया है। कारण यह है की इनके हाथ में जो भी दे दो अंततः यह उसको बर्बाद कर ही देते है। पूरा साउथ एशियाई ख़िता ही ऐसा है। यह कोढ़ है अधिकारियों , मंत्री और राजनैतिक दलों की चाटुकारिता करने का रोग और इस कोढ़ का नाम है चरणचुम्बक कोढ़, क्योकि यह एक मात्र इलाज कर सकने लायक लाइलाज बीमारी है जो इस समाज में अभी दशकों तक बनी रहेगी। यही वह कारन है की जिस अधिकारी के पीठ पीछे ये लोग त्रस्त है, परेशान होते है उसके सामने आते ही उसकी चरण वंदना में लग जाते है। दरी की तरह बिछ जाते है और गोबर की तरह उनके जूते के तल्ले से चिपक जाते है। ऐसा आदमी जिंदगी में कभी व्यवस्था के खिलाफ नहीं बोल सकता है तो ऐसा समाज जो ऐसे ही लोगो से मिलकर बना है कितना ही अपनी आवाज बुलंद कर लेगा और इन्ही में से निकले अगर कुछ बोलना चाहते है तो उसको हाथ पकड़ कर बिठा देने को ये अधिकारियों के प्रति अपनी ड्यूटी समझते है। इन्हे लगता है अधिकारी जी अब इस चाकरी की एवज में कृपा करेंगे अपर वो मरते है उसी गोबर से सना हुआ जूता जिसको ये हंस कर ग्रहण करते है। ऐसा व्यक्ति कैसे कभी अपने ही अधिकारों के लिए खड़ा होगा?

अंग्रेजी बोलने-पढ़ने वाले को अंग्रेजो की औलाद बोलने वाले , हिंदी में गंदी गालियों के अलावा कोई मौलिक योगदान नहीं देने वाले, बेशर्मो की तरह हर दिन वेस्टर्न मेडिसिन , टेक्नोलॉजी , आर्किटेक्चर और यहाँ तक की कानून का उपयोग और उपभोग करके उन्हें ही चरित्रहीन और उनको उनकी औरतो को रशियन बोलकर 6000 में उनकी बोली लगाने वाले अति सिद्ध नीच समाज का युवा केवल एक दब्बू, बिना जिगर का फटेहाल, बेरोजगार, बिना स्किल, मानसिक कुंठित, ज्ञान विमंदित, डिग्रीधारी, पार्टी भक्त, नेता भक्त, अनपढ़ सोशल मीडिया धर्मरक्षक, इन्फ्लुएंसर प्रभावित अगर एक इंटरनेट ट्रोल बन भी जाये तो इसमें को आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिये।

भारत के युवा आज विश्व का सबसे बड़ा इंटनेट ट्रोल है। ये हजारों की संख्या में दुनिया भर के किसी भी राजनैतिक, आर्थिक, मनोरंजन या डिस्कशन मंच पर जाकर घंटे भर में घटिया से घटिया रेसियल slur और mass एब्यूज को initiate कर सकता है। Reddit , इंस्टाग्राम , फेसबुक , क्वोरा, यूट्यूब, सैकड़ो डेटिंग वेबसाइट से लेकर twitch तक पर भी आपको भारतीय युवा की ट्रोलिंग शक्तिया गौरव से भर देगी। Reddit और इंस्टाग्राम भरे पड़े है जातिवादी और धार्मिक उन्मादी भारतीयों से जहा 19-20 साल के लड़के बलात्कार, आत्महत्या, दहेज , जातीय हिंसा , छुआछूत, धार्मिक उन्माद गौरवन्वित होते है, रील बनाते और शेयर करते है और एक दूसरे को लगातार नीचे दिखते है। वो Delete this की बजाये da-lit this लिखते है और किसी कम्युनिटी टारगेट करके कहते है की भाई खड़ा क्यों है मेरी सीट ले लो। 20 साल का भारतीय युवा 2024 में ऐसा है क्योकि 40 और 50 साल का व्यक्ति आज भी feudal mindset से जी रहा है feudal system ही पसंद है।

उस देश में डेमोक्रेसी कैसे चलेगी जहां लोगो को अपना रिप्रेजेन्टेटिव नहीं अपने ऊपर माई-बाप राजा और अधिकारी चाहिये। ये अभी ही 15वी सदी से बाहर ही नहीं निकले है।

मेरा मेरी जनरेशन(28-32) से कोई वास्ता नही है क्योकि इनके पास कोई मुस्तक़िल बेबाक नया ख्याल नही है। इन्होंने सत्तानशीन तानाशाह को अपने दिमाग पर इस तरह काबिज होने दिया कि इनके जहन में उसकी परवाह चढ़ती ताकत का डर घर कर बैठा है। ये आजाद दिखते है पर इन्होंने अपनी आँखों के सामने हवा में जहर की खेती होते देखी हैं। इन्होंने किताबों से बेरुखी दिखाई और साहब के हर बोल को हुकुम समझा हैं।

इन्होंने सिर्फ ओहदेदारों और ओहदों की जी हुजूरी बजाना सीखा है क्योंकि जो इंसान ओहदे को ना नही कह पाया और जिसकी जुबान मोहल्ले के पार्षद के सामने भी उसका गला पकड़ लेती है वो जब बदलाव की बात करते है तो कसम से मुँह पर तमाचा मारने का मन करता है। मन करता है कि जिस जाहिल से कभी 2 किताबें कभी अपने निसाब से बाहर नही पढ़ी उनसे क्या बोले?

मेरा मन करता है जवान बच्चो से बाते करना का क्योकि 20-21 साल की उम्र में उसके पास सीखने को वो तमाम बातें है जो उसको एक बेहतरीन इंसान बनाने में मदद कर सके। ये बच्चे एक हुकूमत का downfall देख रहे है और मेरी नस्ल ने केवल उनको चढ़ते देखा है। सोच का फर्क तो लाजमी है।

इस मंच को दिन पर दिन इतने निम्न स्तर पर जाते देख कर मुझे कोई दुःख नहीं है बस मलाल रहेगा की इतने सारे अच्छे लेखकों का जो इतना मौलिक कंटेंट है जब ये मंच ध्वस्त होकर बंद हो जायेगा तब उसका क्या होगा ? मेरे पास कोई सर्वर नहीं जो मैं वह सब सेव और सिक्योर रख सकूँ। बहुत कुछ पोटेंशियल अभी भी बाकि है पर क्या बिना सभी विचारधारा के मौलिक लेखकों का आगे आये बिना हम ट्रोल और गालीबाजों के हाथों अपने इस मंच को खो देंगे? क्या यह भी उसी भाग्य की तरफ जा रहा है जब एक-एक करके सभी लेखक जो हिंदी के लिए कुछ करना चाहते है कुछ लिखना चाहते है यहाँ से चले जायेंगे ?
मेरा स्वयं का इस मंच पर आना किसी अमावस्या जैसा है , जब आता हूँ तो लगता ही कितने ख़राब मंच पर आ गया हूँ यहाँ तो नफरती पोस्ट और कमेंट के अलावा कुछ नहीं है, पार्टी भक्ति, नेता वंदना और विचारधारा एक नाम पर समाज विशेष को गरियाना और अंत में इन सबसे ज्यादा हृदय विदारक संस्कारी घार्मिक गालीदूतो का प्रकोप जो इस मंच को अर्श से फर्श तक ले आया है।

शायद ऐसे ही करते हुए एक दिन यह मंच तो नहीं पर इसके लेखक Disintegrate हो जायेंगे और हिंदी के नाम पर बचेगी सिर्फ गंदी गालियाँ ?

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-Dinesh Mandora     

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