भ्रष्टाचार के कारण

जब भी मैं लोगों से भ्रष्टाचार के शीर्ष पाँच कारण बताने के लिये कहता हूँ तो वे आमतौर पर किसी पढ़ाये गये तोते की तरह वही घिसे-पिटे जवाब देते है। जैसे तोता अपने मालिक को खुश करके उनसे कुछ खाने को प्राप्त करता है। ये लोग भी वही कारण गिना कर अपने ही दिमाग की पीठ थपथपा देते है की शाबाश तुमने अच्छा जवाब दिया है। कभी कही पढ़े कुछ पांच वाक्यांश जो ये दोहराते हैं जिसमे ये अक्सर मुझे अलग-अलग क्रम में किसी बालक द्वारा सजाये कागजी मेंढक जैसे समान जवाब देते हैं की किसी व्यक्ति के भ्रष्ट व्यक्ति बनने के शीर्ष पाँच कारण निम्न हैं:
  1. व्यक्तिगत लाभ के लिए लालच, चाहे वित्तीय हो या भौतिक।
  2. अपने पद के कारण अपनी शक्ति और उस नियंत्रण का दुरुपयोग।
  3. किसी प्रभावी निगरानी, ​​पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव।
  4. सामाजिक अन्याय, व्यक्ति का पालन पोषण और सामाजिक असमानता।
  5. भ्रष्टाचार की सामाजिक स्वीकृति और उसके प्रति एक दबी हुई सहिष्णुता
हालाँकि, एक समझदार व्यक्ति सभी पाँच कारणों को कई निजी उदाहरणों के माध्यम से खारिज कर सकता है। उदाहरण के लिए,
पहले से ही अमीर अधिकारी और उच्च पदों पर बैठे लोग अक्सर अधिक भ्रष्ट होते हैं। दूसरी और तीसरी पीढ़ी के अधिकारी जिनके घरो में पहले से ही अफसरान रहे है कई बार अधिक सत्ता के भूखे, बेकाबू, उत्पीड़न और दुर्व्यवहार करने वाले होते हैं। अब उत्पीड़न चाहे वो जनता का करे या अपने जूनियर्स का पर करते जरूर है जिसके बिना ये रात को सो नहीं सकते है और यहाँ तक कि उच्च नैतिक कद और कठोर मूल्यों का दंभ भरने वाले, एथिक्स के पेपर में 250 में से 150 नंबर लाने वाले अधिकारी भी अक्सर भ्रष्टाचार के प्रति सबसे अधिक सहिष्णु होते हैं। संक्षेप में, कठोर नैतिक शिक्षा और दार्शनिक अध्ययन और प्रशिक्षण के बाद भी, अधिकांश नौकरशाह कतई भ्रष्ट हैं।

लेकिन यही कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार के मूल कारणों की और गहराई से जाँच करे तो वह कह सकता है कि भ्रष्ट हो जाना या नहीं होना एक जटिल और बहुआयामी कारकों पर निर्भर करता है। जैसे:
  • व्यक्तिगत चरित्र और नैतिक खामियाँ (Individual character and moral imperfections)
  • संस्थागत कमज़ोरियाँ (Institutional weaknesses)
  • सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टिकोण (Cultural and societal perspectives)
  • सत्ता की गतिशीलता और अवसरवादिता (Power dynamics and opportunism)
  • व्यक्तिगत वैचारिक स्थिति (Personal ideological position)
(क्या मैंने ठीक वैसे ही बोला है जैसे एथिक्स के पेपर में लिखना होता है।)

लेकिन जैसा कि ऊपर लिखा है मैं तो इन कारणों से बिल्कुल सरोकार नहीं रखता हूँ। किसी का व्यक्तिगत चरित्र या नैतिकता एक अपेक्षाकृत विकासशील घटना है अंग्रेजी में कहु तो Relatively Developing Phenomenon क्योकि एक व्यक्ति जो समझदार, ईमानदार और मेहनती है वह कुछ परिस्थितियों में रातों रात भ्रष्ट हो सकता है और ऐसा ज़रूरी नहीं कि केवल वित्तीय कारणों से हों।
Morality एक सामाजिक और सांस्कृतिक शब्द है। मैं कहता हूँ Morality गले की घंटी है और हर कोई अपनी घंटी दूसरी के गले में डालना चाहता है और उसको लगता है उनकी घंटी सबसे अच्छी बजती है। हर कोई अपनी नैतिकता की घंटी अपने घर से लाता है और अपने साथ लेकर चलता है चाहे खाने पीने के मामले में हो या कुछ पहनने, पढ़ने और समर्थन देने के मामले में हो। वैसे भी अफसरशाही में Morality कर्तव्य के आचरण में एथिक्स की तुलना में कमतर ही है।
  • कर विभागों जैसी मज़बूत प्रणालियों और संस्थाओं में जहाँ आम आदमी की कौड़ी कोड़ी का हिसाब उसके मरने के बाद भी निकाल लेने की क्षमता है वहाँ बेतहाशा अत्यधिक भ्रष्ट अधिकारी होते हैं। दूसरी और बैंकिंग प्रणाली में किसी अन्य तंत्र की तुलना में शायद मज़बूत पारदर्शिता है, फिर भी प्रशासनिक अक्षमता के कारण कितने ही देशी विदेशी बैंक विफल हो गए हैं और कितने ही कगार पर खड़े है।
  • शक्ति की गतिशीलता (Power dynamics and opportunism) भी निर्णायक कारक नहीं हो सकती है क्योकि जाहिर है, उच्च पदों पर बैठे लोगों में पूर्ण भ्रष्टाचार की संभावना अधिक होती है और ऐसा नहीं है वो करते नहीं है। एक संस्था इस देश में ऐसी है जिसपर लोगो की इतना अंध विश्वास है की अगर उसका नाम लिख दिया तो लोग-लुगाई मेरे घर पत्थर और पैट्रॉल बम फेंके देंगे क्योकि उनका भ्रष्टाचार बड़ा subtle लेकिन ग्रैंड स्केल पर होता है। ये दिखता नहीं है क्योकि इसके लिए सामान्य आँखो का सहारा नहीं लिया जा सकता है।
फिर भी वे ही दूसरों को नियंत्रण में रखते हैं। जैसे, सुप्रीम कोर्ट या इलेक्शन कमिशन ! इस बीच, एक पुलिस कांस्टेबल, जिसके पास सब-इंस्पेक्टर की तुलना में बहुत कम या लगभग कोई शक्ति नहीं होती है, अक्सर आपके द्वारा ज्ञात किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में अधिक भ्रष्ट हो सकता है।

और सामाजिकता के नजरिये से क्या जनता इसीलिए भ्रष्ट है क्योकि अथॉरिटी भ्रष्ट है?

  • आप हेलमेट इसीलिए नहीं पहनते क्योकि आपको पता है आप 100 -200 रूपये देकर छूट जाओगे या आप हेलमेट इसीलिए नहीं पहनते क्योकि आपको पता है कि आपको 200 रूपये लेकर छोड़ दिया जायेगा?
  • आप बिजली चोरी इसीलिए रहे हो की आपको पता है कोई नहीं पकड़ेगा या इसीलिए की आपको पता है सब करते है और कोई नहीं पकड़ रहा है?
  • आप ट्रैफिक नियम इसीलिए नहीं मानते हो की आपको पता है कोई नहीं मानता या फिर इसीलिए की आपको पता है की आप ही मानते हो और कोई तो नहीं मानता है?

मतलब क्या आप नियम इसीलिए तोड़ रहे हो की सब तोड़ते है या इसीलिए की आपको पता है 'सब ही तोड़ते है' या इसीलिए की सब तोड़ते है तो मैं भी तोडूंगा या इसीलिए की बस आप ही नहीं तोड़ते है Etc. Etc. 

तो नियम मानने का कोई रिवॉर्ड नहीं है पर क्या तोड़ने का है? और है तो वो रिवॉर्ड क्यों चाहिए ? क्यो हेलमेट लगाने के लिये , टैक्स भरने के लिये , बिजली बचने के लिये प्रोत्साहन चाहिए? इन प्रश्नो के उत्तर कभी बाद में क्योकि लेख का भाग-1 यहाँ ख़तम हुआ अब आपके लिये एक प्रश्न :

क्या आप भ्रष्टाचार के कारण बता सकते है? 

Image Credit : Meta AI© for WhatsApp 
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M.Dinesh

दिनेश मंडोरा

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