यह लेख एक एक कठिन दार्शनिक पुस्तक का सरलीकरण है। जो आप इस लेख में पढ़ेंगे और जो आप मूल पुस्तक में पढ़ेंगे उस भाषा और Analogy में जमीन आसमान का फर्क मिलेगा क्योकि यह लेख किताब की मेरी व्यक्तिगत समझ है। जितने भी उदाहरण आप नीचे पढ़ेंगे वह सब मैंने मेरी समझ के आधार पर लिखे गए है। किताब में इन सब का कोई जिक्र नहीं है। मेरा प्रयास है की इससे पहले आप किताब पड़े अगर यह लेख पढ़ लेते है तो आपको पुस्तक समझने में बहुत सहायता मिलेगी।
- m.दिनेश
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द स्ट्रक्चर ऑफ साइंटिफिक रेवोल्यूशन्स को थॉमस कुहन(Thomas S. Kuhn) ने लिखा है।
क्या लिखा है इस किताब में ?
देखिए अगर आपका बैकग्राउंड S.T.E.M. नहीं है और उसमे भी आप ने कभी दर्शन, समाजशास्त्र और अन्य Interdisciplinary क्षेत्र की कोई किताब कभी नहीं पढ़ी है तो यह किताब आपके लिए नहीं है। अगर आपकी विज्ञान और उसके दर्शन में अत्यंत रूचि है, आपने दर्शन और समाजशास्त्र पढ़ा है और आप के पास पुस्तके पढ़ने की कला है तो यह किताब बिना STEM से होते हुए भी आपके लिए है।
किताब की भाषा जटिल है क्योकि जैसा मैंने कहा यह STEM में स्नातकोत्तर स्तरीय + कुछ आधारभूत दर्शन का ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद ही आपको यह ठीक से समझ आयेगी।
किताब में 13 अध्याय (चैप्टर) है और प्रत्येक का ऊपरी निचोड़ इस प्रकार है।
अध्याय-1
परिचय : इतिहास की भूमिका
Introduction: A Role for History
लेखक ने विज्ञान की परिभाषा, वैज्ञानिक विकास (Scientific Development) को समझते हुए एक वैज्ञानिक इतिहासकार के दो मुख्य कार्यो पर प्रकाश डाला है।
- पहला इतिहासकार को यह ध्यान रखना होगा की समय के किस बिंदु पर किस व्यक्ति ने किस सिद्धांत , नियम या तथ्य की खोज की और
- दूसरा इतिहासकार को यह भी व्याख्या देनी होगी कि आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान का विकास कैसे कुछ गलत विचारों, त्रुटियों और विश्वासों से बाधित और विलम्बित हुआ है। ये त्रुटियाँ और मिथक समाज में गहराई से जड़ें जमा चुके हैं, जो वैज्ञानिक प्रगति में बाधा डाल रहे हैं।
लेखक ने इतिहास का अध्ययन करने के महत्व पर तर्क देते हुए कहा है कि समय के साथ वैज्ञानिक विचारों का विकास कैसे हुआ यह पढ़ने से समझ आता है की वैज्ञानिक प्रगति की मूल प्रकृति ही गैर-रैखिक है। (Scientific progress is inherently non-linear in nature) विज्ञान कोई तथ्यों का स्थिर संचय नहीं है।
अध्याय दार्शनिक प्रकृति का है और अगर आपके स्वयं के कोई दार्शनिक वैज्ञानिक विचार नहीं है तो बिना पहला अध्याय पूरा किये ही आप इस पुस्तक को कभी ना उठाने के लिए वापस रख दोगे।
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अध्याय-2
सामान्य विज्ञान का मार्ग
The Route to Normal Science
लेखक ने सामान्य विज्ञान (Normal Science) की अवधारणा का परिचय दिया है। Normal Science वह विज्ञान है जिसको वैज्ञानिक समुदाय द्वारा व्यापक रूप से स्वीकार गया है। इस प्रकार के विज्ञान में वह शोध कार्य आता है जिसका आधार विज्ञान की पूर्वर्ती उपलब्धियों पर आधारित है। ये उपलब्धियाँ प्रतिमान(Paradigms) के रूप में कार्य करती हैं और आने वाले भविष्य के शोध कार्य का मार्गदर्शन करती हैं। इस अध्याय में Paradigms शब्द के ऊपर ध्यान केंद्रित किया गया है की कैसे बिना किसी ठोस Paradigms के वैज्ञानिक शोध की असंगठित और दिशाहीन हो जाता है।
जैसे:
- सर् न्यूटन के काम ने ग्रेविटी और कलन की दिशा बदल दी और आने वाले 150 सालो तक विज्ञान की प्रगति में उनका काम (एक पूर्वर्ती उपलब्धि) एक ठोस प्रतिमान (Paradigms) बना रहा।
- ठीक इसी प्रकार श्री जेम्स क्लार्क मैक्सवेल की समीकरणें जिनके आधार पर आने वाले कितने इंजीनियरिंग अविष्कार हुए। वैज्ञानिकों ने विद्युत और चुंबकीय क्षेत्र, प्रकाश और विकिरण से संबंधित विभिन्न समस्याओं को हल करने के लिए इस ठोस प्रतिमान की रेंज के भीतर अपना शोध कार्य किया।
- इस प्रकार प्रोफेसर अमूल रायचौधरी की समीकरण जिनकी सहायता से रॉजर पेनरोज़ ने अपना काम आगे बढ़ाया और भौतिकी का नोबल पुरस्कार जीता था।
- आदरणीय श्री मेघनाद साहा का आयनीकरण समीकरण जिसके बाद भौतिकी में स्टेलर फिजिक्स की पूरी शाखा का विकास हो गया था। उनके महान योगदान के कारण ही साहा को Darwin of Stellar Astrophysics कहा जाता है।
- CRISPR-Cas9 जीन एडिटिंग के आने के बाद यहाँ मॉलिक्यूलर बायोलॉजी और जीन शोध में एक नया ठोस प्रतिमान (Paradigms) बन गया और आज विश्व भर के वैज्ञानिक इस टूल को और ज्यादा बेहतरीन बनने में अपना योगदान दे रहे है।
- इसी प्रकार जिस तरह का विकास क्वांटम कंप्यूटिंग में हो रहा है वह भी एक नार्मल साइंस बन रहा है।
लेकिन हम देखते है कि कृत्रिम बुद्धिमता (आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस/A.I.) में कोई भी सर्वमान्य ठोस प्रतिमान (Paradigms) नहीं है इसीलिए शोध कार्य एक दम असंगठित है और जिस तरह से तरह से A.I. टूल्स का दुरूपयोग हो रहा है यह देखकर लगता है की शोध दिशाहीन भी है। अर्थात AI का शोध fragmented है कोई Clear set of rules नहीं है कोई guiding achievements नहीं जैसे Normal Science में होती है।
इसी प्रकार फ्यूज़न संयंत्र का शोध पिछले 30 वर्षो से प्रायोगिक सीमा नहीं लाँघ पा रहा है और हमेशा वैज्ञानिक अभी sustainable फ्यूज़न 10 वर्ष और दूर है जैसी बचकानी बात करते है। (हालाँकि फ्यूज़न एक जटिल विषय है इस पर मेरी बातें भी बचकानी समझकर छोड़ देनी चाहिये।)
प्रतिमान अर्थात Paradigm वैज्ञानिक समाज में सर्वमान्य सिद्धांतो, शोध के तरीकों, षड के स्तर का एक फ्रेमवर्क है, एक खाका है। इस फ्रेमवर्क में वैज्ञानिक शोध और समस्या का समाधान किया जाता है।
A framework of accepted assumptions, laws, theories, methods, standards, and practices that guide scientific research and problem-solving within a specific scientific community.
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अध्याय-3
सामान्य विज्ञान की प्रकृति
Nature of Normal Science
यहाँ लेखक ने सामान्य विज्ञान अर्थात नार्मल साइंस को पहेली सुलझाने वाली गतिविधि के रूप में वर्णित किया है अर्थात वैज्ञानिक निश्चित ठोस प्रतिमान (Paradigms) की सीमाओं के भीतर शोध करते हैं ताकि उन समस्याओं को हल किया जा सके जिन्हें Paradigms में महत्वपूर्ण माना गया है। सामान्य विज्ञान (नार्मल साइंस) का अर्थ अभूतपूर्व खोज करना नहीं होता है अपितु इसका कार्य है परिशोधन करना क्योकि इसका आधार पूर्वर्ती स्थापित सिद्धांत होते है।
बहुत सरल भाषा में "Normal Science is about Refinement (परिशोधन) rather than groundbreaking discoveries (अभूतपूर्व खोज ) as it builds on established theories.
इसके लिए लेखक कहता है आपके पास तथ्यात्मक वैज्ञानिक जांच के लिए तीन सामान्य फ़ोकस बिंदु होने चाहिये। (Three normal foci for factual scientific investigation)
- महत्वपूर्ण तथ्यों का निर्धारण (Determination of Significant Facts) : जो हमें ज्ञात है , वैज्ञानिक ऐसे ज्ञात तथ्यों की सीमा का विस्तार करने पर अपना काम करते हैं। यह वह तथ्य है जो वर्तमान प्रतिमान(current paradigm) के अनुरूप हैं। उदाहरण : वह डेटा एकत्र करना जिसे स्थापित सिद्धांतों के ढांचे मतलब फ्रेमवर्क के भीतर समझाया जा सकता है।
- सिद्धांत के साथ तथ्यों का मिलान (Matching Facts with Theory): शोधकर्ता को चाहिए कि उसके कार्य से सैद्धांतिक भविष्यवाणियों जो गणित ने की है और तथ्य या डेटा जो हमारे पास संकलित है उनको मिलाकर सिद्धांत को और परिष्कृत और बेहतर बनाना है। इसमें माप की सटीकता(Accuracy of Measurement) बढ़ाना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है।=
- प्रतिमान को स्पष्ट करना (Articulating the Paradigm): इस बिंदु में जो प्रतिमान उसकी सहायता से हमको समस्या को सरल करना है और इस प्रतिमान को और ज्यादा परिष्कृत करना है। शोधकर्ता को ऐसी समस्याओं को भी संबोधित करना है जिन्हें अभी तक पूरी तरह से समझाया नहीं गया है। इससे प्रतिमान की सीमाओं का भी परीक्षण होता है कि Paradigm बिना टूटे कहा तक हमारे प्रश्नो के जवाब देता है।
अगर उदाहरणो से समझे तो
- क्लासिकल यांत्रिकी जिसको न्यूटोनियन यांत्रिकी भी कहते है उसमे लैग्रेंजियन और हैमिल्टनियन यांत्रिकी (Lagrangian and Hamiltonian mechanics) के सूत्रों का विकास बाद में हुआ था। इन्हीं सूत्रों को वैज्ञानिकों ने परिष्कृत किया और बाद में इनका उपयोग करके वैज्ञानिकों ने Celestial mechanics, Mechanical Oscillators और Rigid Body Motion जैसी जटिल प्रणालियों का अध्ययन किया। उसका फायदा यह हुए की की हमारे पास रॉकेट भौतिकी और इंजीनियरिंग का भी उन्नत विकास हुआ।
- ऐसे ही इलेक्ट्रोडायनामिक्स में मैक्सवेल के समीकरणों के ढांचे के भीतर इलेक्ट्रोस्टैटिक क्षेत्रों का अध्ययन नॉर्मल साइंस का उदाहरण है। वैज्ञानिक कंडक्टर और इंसुलेटर में आवेशों के व्यवहार और उनकी समस्याओं को हल करते हैं।
- जलवायु परिवर्तन एक अध्ययन भी एक उदाहरण है और मशीन लर्निंग जो अब बड़े डाटासेट पर ट्रेनिंग और अल्गोरिथम की Refining करने पर ज्यादा केंद्रित है।
- जबकि Nutrition साइंस में कोई Paradigm फ्रेमवर्क नहीं है तो जिसका जो मन आता है वही अपना फर्जी ज्ञान देता फिरता है। Chiropractor भी उसकी थाली के बैंगन है।
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अध्याय-4
पहेली समाधान के रूप में सामान्य विज्ञान
Normal Science as Puzzle Solving
इस अध्याय में इस बात पर जोर दिया गया है कि वैज्ञानिक अपने शोध कार्य को एक पहेली- सुलझाने मतलब Puzzle सॉल्वर की तरह एप्रोच करते है। जब आप कोई Puzzle सॉल्व करते है तो आपको पता होता हैं कि पूरा होने पर यह कैसा दिखेगा। ठीक इसी तरह वैज्ञानिकों को भी पता होता है कि पहेली सरल होगी अर्थात इस शोध समस्या का निष्कर्ष क्या है लेकिन उनके लिये निष्कर्ष पर पहुंचने से ज्यादा चुनौतीपूर्ण वह रास्ता है जिसपर चलकर वह उस समस्या को सुलझायेंगे।
परिणाम पूर्वानुमानित होता है लेकिन उस तक पहुँचने का तरीका चुनौतीपूर्ण होता है।
The outcome is predictable but the method of reaching it is challenging.
लेखक यही बताना चाहता है कि सुनिश्चित समाधानों से भरा भविष्य जानने के बाद भी समस्याओं पर यह एकाग्रता और ध्यान वैज्ञानिकों का अपने कार्यों के प्रति समर्पण दिखाता है।(Kuhn highlights that this focus on problems with assured solutions explains the devotion scientists have to their tasks.)
- मैक्सवेल समीकरणों के Paradigm में रहते हुए वैज्ञानिकों ने एलेक्ट्रोडीनमिक्स (Electrodynamics) में विद्युत चुम्बकीय तरंगों को प्रसारित करने के लिए वेवगाइड का विकास किया।
- केप्लर के ग्रहीय गति के नियमो को न्यूटन की यांत्रिकी के फ्रेमवर्क में समझाना भी ऐसी ही Puzzle सॉल्विंग है।
- COVID-19 के दौरान कम समय में न्यूनतम से लेकर शून्य दुष्प्रभाव वाली , कम कीमत की और mass प्रोड्यूस की जा सकने वाली वैक्सीन बनाना भी ऐसी ही Puzzle सॉल्विंग है।
- वैज्ञानिक लिथियम-आयन बैटरी के मौजूदा फ्रेमवर्क में ही ऊर्जा घनत्व, लागत और स्थिरता से संबंधित छोटी पहेलियों को हल कर रहे हैं ताकि बैटरी प्रौद्योगिकी का विकास करके और किफायती, उच्च ऊर्जा संग्राहक, भरोसेमंद और अनेक वर्षो तक चल सकने वाली और छोटी लेकिन ताकतवर बैटरी उपलब्ध करवाई जा सके।
- लेकिन इसका एक काउंटर भी है चेतना के ऊपर मौजूदा वैज्ञानिक शोध इस Puzzle सॉल्विंग फ्रेमवर्क में सटीक नहीं बैठते है। शोध का कोई सलूशन नहीं है और फॉलो करने के लिए कोई फ्रेमवर्क भी नहीं है।
- इसी तरह कैंसर शोध का Puzzle सॉल्विंग Paradigm में हमारी बायोलॉजी की जटिलता की वजह से आगे नहीं बढ़ पा रहा है। Chemotherapy और Radiation जैसे इलाज हमारे पास है पर अभी भी कितने ही क्षेत्रों में हमारा ज्ञान कम है।
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अध्याय -5
प्रतिमानों की प्राथमिकता
The Priority of Paradigms
इस अध्याय में लेखक ने इस बात पर बल दिया है कि वैज्ञानिक जांच का मार्गदर्शन कोई स्पष्ट नियम या सिद्धांत नहीं करते है अपितु यह तो प्रतिमान (Paradigms) द्वारा मार्गदर्शित होता है।
Paradigms, not explicit rules or theories, guide scientific Inquiry.
और अगर यहाँ तक पढ़ते-पढ़ते आप भूल गए है की Paradigms क्या होते है तो बता देता हूँ कि पूर्वर्ती वैज्ञानिक उपलब्धियों ही आधारित फ्रेमवर्क प्रतिमान (Paradigms) है।
प्रतिमान (Paradigms) उन समस्याओं को परिभाषित करते हैं जो जांच के लायक हैं अर्थात प्रतिमान (Paradigms) बताते है कि किस समस्या की जाँच करनी चाहिये और वैज्ञानिक उनका उपयोग करते हुए विश्व और ब्रह्मांड के बारे में अपनी समझ का दायरा विस्तार करते है। इस अध्याय में मूलत: प्रतिमानों की प्रकृति और वैज्ञानिक अभ्यास के लिए उनकी केंद्रीयता पर प्रकाश डाला गया है।
- Galilean Invariance को जब तक रिलेटिविटी से चुनौती नहीं मिली तब तक अधिकतर क्लासिकल मैकेनिक्स को वही निर्देशित कर रही थी।
- ऐसे ही फैराडे का प्रेरकत्व नियम लंबे समय तक विद्युतचुंबकीय क्षेत्र में शोध का फ्रेमवर्क रहे है
- नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) के क्षेत्र में आज वैज्ञानिक लगातार किफायती और अधिक ऊर्जा पैदा करने वाले उच्च क्षमता के तरीके खोज रहे है।
- डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत एक मजबूत प्रतिमान है और आज भी Genetics, Paleontology और biology के शोध इसी प्रतिमान के रेंज में analyze किये जाते है।
ध्यान रहे अध्याय 2, 3 और 4 की तरह ही 5 भी भाषायी रूप से कठिन है। उदाहरण जटिल है और Paradigms और Puzzle सॉल्विंग जैसी Analogy से आप सच में परेशान हो सकते है।
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अध्याय-6
विसंगति और वैज्ञानिक खोजों का उद्भव
Anomaly and the Emergence of Scientific Discoveries
वैज्ञानिक प्रगति अक्सर विसंगतियों अर्थात Anomaly की पहचान करने से शुरुर होती है। Anomaly क्या होती है? ऐसी घटनाएँ जो मौजूदा प्रतिमान (Paradigm) में फिट नहीं होती हैं।
विसंगति एक ऐसी घटना या परिणाम (Phenomenon or Result) होता है जो किसी प्रमुख वैज्ञानिक सिद्धांत या प्रतिमान की प्रिडिक्शन या assumption के विरोध में कोई डेटा या ऑब्जरवेशन प्रस्तुत करता है। यह डेटा या ऑब्जरवेशन बिलकुल अप्रत्याशित होते है और जब वैज्ञानिक इनको समझाने के लिये वर्तमान प्रतिमान (Paradigm) का उपयोग करते है तो हमें उस प्रतिमान की सीमाओं (Limits) या विफलताओं (Failure) के बारे में पता लगता है।
उदाहरण से अगर हम समझे तो
- 19वी सदी के अंत तक ब्लैकबॉडी विकिरण और Ultraviolet catastrophe को समझने के लिये क्लासिकल मैकेनिक्स के सभी प्रयास विफल हो गए थे। वह उस समय एक विसंगति अर्थात Anomaly थी और प्लांक की ऊर्जा क्वांटा (Energy quanta) परिकल्पना के बिना उसको समझा नहीं जा सका था। प्लांक के 1900 के शोध पत्र के बाद से अगले 40 सालों में जिस तरह से क्वांटम भौतिकी का विकास हुआ आज क्वांटम मैकेनिक्स सबसे सफल भौतिकी सिद्धांतो में से एक है।
- माइकलसन-मोरले के प्रयोग ने ईथर के अस्तित्व को नकार दिया और न्यूटोनियन यांत्रिकी के द्वारा मरकरी ग्रह के कक्षीय घूर्णन की विसंगति को समझाया नहीं जा सका और यहाँ से श्रीमान आइंस्टीन के क्रमशः सापेक्षिता के विशिष्ट सिद्धांतो(Special theory of relativity) और सापेक्षिता के सामान्य सिद्धांतों (General theory of relativity) के लिए मार्ग प्रशस्त हुआ।
- आकाशगंगाओ के घूर्णन और द्रव्यमान तथा क्लस्टर संतुलन (Equilibrium)की समस्या को वर्तमान अक कोई कॉस्मोलॉजिकल मॉडल समझना नहीं पा रहा था तो डार्क मैटर की परिकल्पना ने इसमें सहयोग किया है
इस प्रकार हम देखते है की कैसे विसंगति अर्थात Anomaly नयी खोजों और नये मजबूत प्रतिमानों की स्थापना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यहाँ मैं कहना चाहूंगा कि ब्लैक बॉडी विकिरण और प्लांक के सिद्धांत, माइकलसन मोरले के प्रयोग और डार्क मैटर के ऊपर मैंने काफी विस्तृत लिख है और आप अधिक जानकारी के लिए उन्हें पढ़ सकते है।
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अध्याय - 7
संकट और वैज्ञानिक सिद्धांतों का उद्भव
Crisis and the Emergence of Scientific Theories
अध्याय में लेखक ने विसंगतियों अर्थात Anomalies को एक नए परिपेक्ष्य से समझाने का प्रयास किया है। यह अध्याय अब तक आपके पढ़े पूर्वर्ती 6 अध्यायों से काफी जटिल है। यह अध्याय इस विषय वस्तु को हमारे सामने रखता है कि जब किसी प्रतिमान (Paradigm)के समक्ष पर्याप्त विसंगतियाँ आकर खड़ी हो जाती है तो वह प्रतिमान के औचित्य और उसकी सीमाओं पर एक प्रश्नचिन्ह लगा देती है। ऐसे संकट(Crisis) के दौरान, वैज्ञानिक विसंगतियों को समझाने के लिए नए सिद्धांतों की खोज या रचना करते हैं।
जैसा की हमने पीछे अध्याय के उदाहरणों में देखा
- परमाणु की स्थिरता, ऊर्जा का परिमाणीकरण, फोटोइलेक्ट्रिक प्रभाव, ब्लैकबॉडी विकिरण यह वह एक के बाद एक आती तमाम विसंगतिया (anomaly) थी जिनको समझाने में क्लासिकल यांत्रिकी फैल हो गई और क्वांटम यांत्रिकी का उद्भव हुआ दिया। क्लासिकल यांत्रिकी पर आये इस संकट(Crisis) के कारण ही क्वांटम सिद्धांत ने यांत्रिकी और इलेक्ट्रोडायनामिक्स दोनों को फिर से परिभाषित किया।
- जनरल और स्पेशल रिलेटिविटी के उद्भव भी इसी प्रकार के संकट अर्थात Crisis का परिणाम है।
- Covid -19 के संकट (Crisis) में हमें देखा की विश्व भर में संक्रामक बीमारियों के बचाव और रोकथाम, वैक्सीन निर्माण की निति और तरीको , सरकारों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच संयोजन और healthcare के सभी तरीको को एक बड़ी चुनौती मिली जिसने हमारे इस क्षेत्र में सोचने और रियेक्ट करने के तरीको को बहुत बदल दिया है।
- AI टूल्स के दुरूपयोग और उन तक लोगो की पहुंच ने हमारे एथिकल लिमिट को टेस्ट करना शुरू कर दिया है।
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अध्याय - 8
संकट की प्रतिक्रिया
Responding to Crisis
इस अध्याय में लिखने ने इस विषय पर चर्चा की है कि वैज्ञानिक संकटों अर्थात Crisis पर प्रतिक्रिया कैसे करते हैं। वो कहते है की जब भी किसी वैज्ञानिक सिद्धांत या परिकल्पना पर किसी नये प्रायोगिक परिक्षण द्वारा, किसी नए गणितीय टूल द्वारा या सिमुलेशन और ऑब्जरवेशन द्वारा Anomaly Impose की जाती है तब ऐसे संकट के समय में इन विसंगतियों से विमुख होकर कुछ वञनैक पुराने प्रतिमान(Paradigm) से ही चिपके रहते हैं, जबकि बाकि वैज्ञानिक समुदाय इस विसंगतियों को सरल करने उन्हें समझने के लिये अन्य मौलिक विचारों की खोज करते हैं या अपनी थ्योरी को परिशुद्ध अर्थात Refine करने का रास्ता अपनाते है। यह अध्याय विज्ञान में Tradition और Innovation के मध्य एक तनाव को गहराई से समझने के लिये है।
जब अल्बर्ट आइंस्टीन ने 1905 में स्पेशल रिलेटिविटी पर अपना शोध पत्र "ऑन द इलेक्ट्रोडायनामिक्स ऑफ मूविंग बॉडीज", प्रकाशित किया तब उनके कार्य को बहुत संदेह पूर्वक देखा गया था। आइंस्टीन के पेपर ने पूर्व स्थापित न्यूटोनियन यांत्रिकी के प्रतिमान को चुनौती दी थी। लोग ऐसे अवधारणाओं के लिए तैयार नहीं थे कि प्रकाश की गति एक नियतांक है और समय की द्रव्यमान और गति के सापेक्ष होता है।
उनके इन सिद्धांतो का इतना विरोध हुआ कि वैज्ञानिक फिलिप लेनार्ड और जोहान्स स्टार्क ने तो आइंस्टीन के सिद्धांतों को "यहूदी भौतिकी (Jewish Physics) बोलकर ख़ारिज कर दिया था। लेकिन आज वही सिद्धांत आधुनिक भौतिकी के नींव के पत्थर है।
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अध्याय - 9
वैज्ञानिक क्रांतियों की प्रकृति और आवश्यकता
The Nature and Necessity of Scientific Revolutions
लेखक ने इस अध्याय में वैज्ञानिक प्रगति के लिए वैज्ञानिक क्रांतियाँ अर्थात Scientific Revolutions की आवश्यक पर बल दिया हैं। ये क्रांतियाँ (Revolutions) तब होती हैं जब एक नया प्रतिमान पुराने प्रतिमान की जगह लेता है। इस नए प्रतिमान से वैज्ञानिक शोध और ज्ञान विज्ञान को एक मौलिक दिशा में आगे बढ़ाते है।
जैसे: आइंस्टीन की फील्ड समीकरणों ने न्यूटोनियन यांत्रिकी की गुरुत्वाकर्षण समझाने के मेथड्स को प्रतिस्थापित कर दिया। यह न्यूटोनियन यांत्रिकी से रेलटीवीस्टिक मेकेनिक्स की तरफ का एक हुई एक क्रांति थी।
- एक क्रांति मैक्सवेल की समीकरणों से क्वांटम Electrodynamics की तरफ हुई है जहाँ फोटोन और आवेशित कणों ने विधुत चुंबकीय शोध के मूल को बदल कर रख दिया।
- एक और क्रांति क्लासिकल फील्ड थ्योरी, स्पेशल रिलेटिविटी और क्वांटम मैकेनिक्स को मिलाने की कवायद क्वांटम फील्ड थ्योरी (QFT) ने अनेक नयी परिकल्पनाओं को जन्म दिया है।
- इसी से एक विशेष तरह की QFT जन्मी जिसको को पार्टिकल फिजिक्स में क्वांटम Chromodynamics (QCD) कहते है।
यह अध्याय पढ़ने में कठिन है और इसमें क्योकि क्रांतियों (Scientific Revolutions) और नार्मल विज्ञान के मध्य व्यवहारिक और सैद्धांतिक अध्ययन किया गया यही तो यह चैप्टर अत्यंत सावधानी से पढ़े जाने वाला है।
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अध्याय -10
विश्व दृष्टिकोण में परिवर्तन के रूप में क्रांतियाँ
Revolutions as Changes of World View
वैज्ञानिक क्रांतियाँ केवल सिद्धांत में परिवर्तन नहीं हैं। क्रांतिया वैज्ञानिकों द्वारा दुनिया को देखने के तरीके में भी बदलाव का प्रतिनिधित्व करती हैं। विश्वदृष्टि अर्थात वर्ल्डव्यू में ये बदलाव ठीक ऐसे है जैसे अवधारणात्मक परिवर्तनों में बदलाव हो जाये। जो डेटासेट जिसके ऊपर दुनिया को देखने का परिपेक्ष्य कुछ और था अब उसी डाटा सेट में आमूलचूल परिवर्तन से पूरा नजरिया ही बदल जाता है। जहाँ वैज्ञानिक एक ही डेटा को अब नए तरीकों से देखते हैं। जैसे :
- आइंस्टीन की रिलेटिविटी इसका अच्छा उदाहरण है।
- क्वांटम मैकेनिक्स में अनिश्चितता सिद्धांत , तरंग कण द्वैतात्मक सिद्धांत ने वैज्ञानिको के देखने का नजरिया बदल दिया।
- ब्लॉकचैन सिद्धांत ने डाटा सुरक्षा और स्टोरेज के हमारे नजरिये (Perspective) में बदलाव कर दिया।
- AI टूल्स ने हमारे खुद के शिक्षण संस्थानों और कई स्किल सेट्स को बदल दिया है।
- जैव ईंधन और उनके दोहन को हम काम करने की डिश में प्रयासरत है क्योकि वह एक दिन समाप्त हो जायेंगे और हमें Nuclear और सोलर को और ज्यादा Explore करना होगा।
- प्लास्टिक के उपयोग को लेकर हमारा नजरिया मइक्रोप्लास्टिक की समस्या ने बदल दिया है।
- गर्म होते ग्लोब और क्लाइमेट चेंज पर वैज्ञानिको की एकमत राय ने आज विश्व की सभी सरकारों को इस दिशा में कदम उठाने के लिए विवश कर दिया है।
तो यह कुछ उदाहरण है कि किस तरह से विश्व दृष्टिकोण बदलने में वैज्ञानिक दृष्टिकोण कितना महत्वपूर्ण हिस्सा है।
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अध्याय - 11
क्रांतियों की अदृश्यता
The Invisibility of Revolutions
वैज्ञानिक क्रांतियाँ अर्थात Scientific Revolutions सामान्य व्यक्ति द्वारा कभी भी नोटिस नहीं की जाती है। जैसे ही कोई वैज्ञानिक क्रांति होती है सभी पाठ्य पुस्तकों को दुबारा से लिखा जाता है। सिलेबस बदला जाता और कक्षाओं में अब क्या पढ़ाया जायेगा उसका तरीका बदला जाता है। यह 25 से लेकर 50 सालों की अवधि के दौरान होता है। पुराने प्रतिमान हटाकर उनको नए प्रतिमानों से प्रतिस्थापित कर दिया जाता है और इस प्रोसेस में सामान्य व्यक्ति को ऐसा लगता है की कि विज्ञान ने रैखिक रूप अर्थात लीनियर रूप से प्रगति की है। किताबों में आमूलचूल परिवर्तन हुए हैं क्योकि जो पढ़ाया जा रहा है वह अधिकतम पुराना ही है केवल कुछ पाठ नए है जबकि ऐसा नहीं है। क्रांति से हुआ बदलाव अत्यंत सुदृढ़ और महत्वपूर्ण होता है।
- जैसे की अगर आपने 70 के दशक में बीएससी इत्यादि की है तो आप देखेंगे की आज बच्चे क्वांटम मैकेनिक्स का 3rd ईयर में पूरा कोर्स पढ़ते है। वह कोर्स तब इस स्तर पर इतना Refine नहीं था।
- कभी विश्विद्यालयों में मॉडर्न फिजिक्स नाम का कोर्स था लेकिन आज के समय यह शब्द का कोई अर्थ नहीं है। मॉडर्न फिजिक्स दरअसल अब बहुत परिष्कृत रूप में पढ़ाया जाता है। जैसे क्वांटम , नुक्लिअर, सॉलिड स्टेट, सेमीकंडक्टर इत्यादि।
- जब स्टेटिकल यांत्रिकी का विकास हुआ और बोल्ट्ज़मैन(Boltzmann) ने एन्ट्रॉपी जैसे सिद्धांतो को उजागर किया तब कई वैज्ञानिको ने ही उसको शोध के प्रतिकूल बताया था।
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अध्याय -12
क्रांतियों का समाधान
The Resolutions of Revolutions
एक क्रांति अर्थात साइंटिफिक रेवोलुशन के बाद वैज्ञानिक सामने आई नयी विसंगतियों (Anomaly) का समाधान करने और इस नए प्रतिमान को स्थिरता में लाने के लिए काम करते हैं। यह नया प्रतिमान इस रिफाइनिंग प्रोसेस से निकलकर अंततः अगली बड़ी वैज्ञानिक क्रांति होने तक सामान्य विज्ञान (नॉर्मल साइंस) की नींव बन जाता है।
- जनरल रिलेटिविटी का उदाहरण हम ले सकते है जहा अब रिलेटिविटी गुरुत्वाकर्षण समझने और शोध का नया प्रतिमान है।
- क्वांटम यांत्रिकी एक उदाहरण है जिसने माइक्रोस्कॉपिक संसार को समझने में पूर्व के सभी प्रतिमानों को विस्थापित कर दिया है।
- क्लासिकल इलेक्ट्रोडायनामिक्स से क्वांटम इलेक्ट्रोडायनामिक्स तक का सफर भी अच्छा उदाहरण है।
अब जब तक हम अगला कुछ मूलभूत नहीं खोज लेते है यह प्रतिमान शोध का आधार और फ्रेमवर्क बने रहेंगे। प्रतिमान के स्थिरीकरण के अंतिम दो अध्याय भाषाई और दार्शनिक दोनों ही स्तरों पर पढ़ने और समझने में थोड़े कठिन है। इसके मूल को अच्छे से समझने केलिए आपका वैज्ञानिक प्रगति की चक्रीय प्रकृति(Cyclical Nature of Scientific Progress) की अपनी समझ को बढ़ाना होगा।
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अध्याय -13
क्रांतियों के माध्यम से प्रगति
Progress Through Revolutions
पुस्तक के अंत में लेखक यह निष्कर्ष निकलते है कि वैज्ञानिक प्रगति रैखिक नहीं है। वैज्ञानिक प्रगति कई वैज्ञानिक क्रांतियों का एक श्रृंखला का परिमाण है। सामान्य व्यक्ति जो अपने जीवन में व्यस्त है उसके लिए विज्ञान और उसका विकास किसी सरल रेखीय पथ जैसा होता है क्योकि उनको एक दम Refined सधी हुई पाठ्य पुस्तक पढ़ने को मिलती है। उन्हें चैप्टर दर चैप्टर बढ़ने से लगता है कि विज्ञान वास्तविक जीवन में, लैब में, ब्लैकबोर्ड पर भी ऐसे ही बढ़ता होगा जबकि वास्तविकता उसके बिलकुल उलट है। प्रत्येक नया प्रतिमान(Paradigm) विज्ञान को दुनिया को समझने के करीब लाता है, लेकिन यह प्रगति क्रमिक नहीं है।
This progress is not gradual—it is marked by sudden, radical shifts.
e.g. QCD, QFT, QED, जनरल और स्पेशल रिलेटिविटी और ग्रैंड यूनिफाइड थ्योरी के लिए खोज सभी कुछ एक रेडिकल शिफ्ट है जो लीनियर नहीं है।
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m.दिनेश©
-Dinesh Mandora
Dinesh Mandora All rights reserved ©
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