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इतिहास से सीखा ?

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मुझे नहीं लगता है भारतीयों को अपना इतिहास लिखना भी आता है और इसीलिए जनमानस को इतिहास पढ़ना भी नहीं आता है।  ज्यादातर तो मैंने यही पाया है की किसी भी करैक्टर के बारे में बात करते समय तथाकथित भारतीय इतिहासकारों ने अधिकतर समय उनका बस mythologization ही किया है। यहाँ तक की राजा अपनी माँ के गर्भ से सीधा अपनी माता और पिता के बीच संभोग से नहीं किसी ना किसी प्रकार के Divine Intervention से ही पैदा होते है।  ये Divine इंटरवेंशन का  एक कारण  यह भी है की सामान्य बुद्धि यह समझने में विफल है की असामान्य लोग कुछ नहीं होते है।  राजा-रंक, आम- खास, चपरासी -अधिकारी, संत-शैतान सब एक ही समाज में एक साथ विचरते है और इस बात की प्रबल सम्भावना भी है की आप एक दूसरे के पड़ोसी है। 16वी सदी में जापान में एक तोयोतोमी हिदेयोशी(Toyotomi Hideyoshi) नाम का एक बड़ा सामंती राजा हुआ।  वो एक Daimyo था जो की एक बड़ा ओहदा होता है। अपने जन्म के मूल रूप से वो एक सामान्य आदमी था जिसने लार्ड ओडा नोबुनागा के पास एक सैनिक के रूप में अपना सफर शुरू किया लेकिन काबिलियत के दम पर ऊपर पंहुचा। Daimyo बनने के लिए...

इतिहास बनाम चयनात्मक अनपढ़ता

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Curse of Selective Illiteracy    एक अजीब सी मूर्खता का निर्माण हो गया है आजकल चारों तरफ और यह मूर्खता सामाजिक तो है ही सांस्कृतिक भी है। यह है स्वयं का अद्भुत गौरवशाली इतिहास पढ़ने का और उसकी वाहवाही करने का पर उसके लिए लेशमात्र भी प्रयास नहीं करने का दोगलापन लेकिन उस अनकहे इतिहास की डींग हाँकने में जरा भी पीछे नहीं रह जाना। यह किस प्रकार का सामाजिक बौद्धिक दिवालियापन है जहाँ तथाकथित शिक्षित वर्ग ही स्वाध्याय से कौंसो दूर है। यदि कोई इक्का दुक्का व्यक्ति किसी प्रकार कुछ पढ़ता भी है तो उनकी जबान हो या लेखनी वैचारिक पूर्वाग्रह का अपना विष प्रकट करती रहती है। लेकिन इस से भी बढ़कर समस्या यह है कि बड़ा सामाजिक तबका किताबों से इतना दूर है कि अपनी कला , संस्कृति , इतिहास , सभ्यता के विकास वैज्ञानिक और तकनीक ज्ञान के विकास , वैचारिकता और दर्शन में योगदान सभी से ये तबका अंजान है और यही स्वराष्ट्र , स्व-संस्कृति के प्रति अज्ञान , स्थिरता और जड़त्व के कारण ही पूर्व में भी भारतीय संस्कृति का हास्य और हास दोनों हुआ है। क्या पढ़े क्या नहीं पढ़े का प्रश्न तो बाद में आता है पहले क्या हम...

क्या विज्ञान अंधविश्वास को बढ़ावा दे सकता है?

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क्या विज्ञान अंधविश्वास को बढ़ावा दे सकता है? क्यों ना इसमें एक बात और जोड़ दी जायें की क्या विज्ञान विश्वास को बढ़ावा देता है ? बिल्कुल नहीं । विश्वास, अंधा-विश्वास, अविश्वास और कुमार विश्वास किसी का भी विज्ञान से कोई लेना देना नहीं है। हवा-पानी, जीवन-बीमारी-मृत्यु, सूर्य,चंद्रमा, मोबाइल, रेडियो तरंग,परमाणु, फोटोन इत्यादि में आप विश्वास नहीं करते हो यह सब वैज्ञानिक और प्राकृतिक सत्य है। कल को कोई विद्युत चुम्बकीय विकिरण के अस्तित्व को ना माने तो क्या फर्क पड़ जायेगा ? उनके मानने या ना मानने से या फिर किसी के भी ना मानने से कभी कोई वैज्ञानिक तथ्य नही बदल जाता है।  कल को कोई कहे में साँप का काटा मेरे बाबा या पीर जी के दिए बीजमंत्र और ताबीज से छुवाकर सही कर दूंगा तो यह उनका व्यक्तिगत मामला है, क्या मौत विश्वास करने से  रुक जाएगी ? कैंसर फैक्ट है विश्वास नहीं। अगर किसी को अपनी माँ की बातों पर विश्वास नहीं की उसके मौजूदा पापा ही उसके पापा है तो डीएनए जाँच करवा लीजिये। अगर जांच में मैच नहीं होने पर भी मम्मी इस बात पर टिकी रहे तो वह व्यक्ति विश्वास करेगा ? या वैज्ञानिक सबूत का चुनाव ...