इतिहास बनाम चयनात्मक अनपढ़ता

Curse of Selective Illiteracy 



 एक अजीब सी मूर्खता का निर्माण हो गया है आजकल चारों तरफ और यह मूर्खता सामाजिक तो है ही सांस्कृतिक भी है। यह है स्वयं का अद्भुत गौरवशाली इतिहास पढ़ने का और उसकी वाहवाही करने का पर उसके लिए लेशमात्र भी प्रयास नहीं करने का दोगलापन लेकिन उस अनकहे इतिहास की डींग हाँकने में जरा भी पीछे नहीं रह जाना। यह किस प्रकार का सामाजिक बौद्धिक दिवालियापन है जहाँ तथाकथित शिक्षित वर्ग ही स्वाध्याय से कौंसो दूर है। यदि कोई इक्का दुक्का व्यक्ति किसी प्रकार कुछ पढ़ता भी है तो उनकी जबान हो या लेखनी वैचारिक पूर्वाग्रह का अपना विष प्रकट करती रहती है। लेकिन इस से भी बढ़कर समस्या यह है कि बड़ा सामाजिक तबका किताबों से इतना दूर है कि अपनी कला, संस्कृति, इतिहास, सभ्यता के विकास वैज्ञानिक और तकनीक ज्ञान के विकास, वैचारिकता और दर्शन में योगदान सभी से ये तबका अंजान है और यही स्वराष्ट्र, स्व-संस्कृति के प्रति अज्ञान, स्थिरता और जड़त्व के कारण ही पूर्व में भी भारतीय संस्कृति का हास्य और हास दोनों हुआ है।

क्या पढ़े क्या नहीं पढ़े का प्रश्न तो बाद में आता है पहले क्या हम पढ़ने वाला समाज है ? शिक्षा क्या है इसकी परिभाषा बताने वाले शिक्षक तक आप नहीं ढूँढ़ पायेंगे। जब नींव के निर्माणकर्ता में ही दोष है, जब उसका बौद्धिक स्तर ही अध्यापन को केवल नौकरी और धन कमाने से अधिक कुछ नहीं मानने वाला है ऐसा शिक्षक जिस प्रकार के विद्यार्थी का निर्माण करेगा वह विद्यार्थी भविष्य में एक सोचता समझता और वाद की संस्कृति को आधार देने वाला नागरिक कैसे बनेगा?

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यदि इस प्रकार के शैक्षिक तंत्र में से कोई विद्यार्थी विशिष्ट और विरला निकल भी आता है तो यह मूलतः उस विद्यार्थी की व्यक्तिगत बौद्धिक उपलब्धि होती है। शायद किसी स्तर तक उसके उपर किसी अध्यापक , व्यक्ति विशेष , परिवारजन या फिर उसकी परवरिश के कुछ तत्व भी सहयोग करते है लेकिन यह सब सामान्यतः निश्चित सीमा मे ही प्रभावी होते है। मूल हमेशा व्यक्तिगत होता है।

वापस विषय पर आते है “इतिहास बनाम अनपढ़ता“ का मूल यह है कि यदि आप अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक, कलात्मक, वैचारिक और अन्य किसी भी प्रकार के इतिहास को सीखना पढ़ना और समझना चाहतें है तो बिना किसी पूर्वाग्रह और पक्षपात के स्वाध्याय के द्वारा ही पहला कदम आगे बढ़ाना चाहिए। क्योंकि स्वाध्याय आपमें स्वयं सीखकर निष्कर्ष तक पहुंचने की कला का निर्माण है, आपके पास स्वयं का मस्तिष्क है और वह काम करता है। कोई क्यों स्वयं किताबें पढ़कर अपना समय लगाकर आप तक उनका सार पहुंचाता है ?  वर्तमान में कुछ भी मुफ्त नहीं है और ना ही पहले कभी था। मानवीय सामाजिक ताना-बाना एक हाथ ले और दूसरे हाथ दे के मूल से बंधा हुआ है। जब कोई कहता है कि हमें हमारा इतिहास नहीं पढ़ाया गया तब आपको उनसे प्रश्न करना चाहिए कि 

कौन पढ़ायेगा तुम्हे तुम्हारा इतिहास ?

गोरे साहब आयेंगे लंदन से? या कब्रों से उठकर जहाँपनाह और आलमगीर?

बहादुर शाह ज़फर या अकबर द्वितीय ? शाह आलम फिर मोह्हमद शाह? फ़र्रुख़सियर या बहादुर शाह? आदिल शाह सूरी या शेर शाह सूरी या फिर हुमायुँ ? बाबर या इब्राहिम लोधी? सैयद तख्त या तुगलक ? अल्लाउद्दीन खिलजी , जलालुदीन खिलजी या फिर क़ुतबुद्दीन ऐबक? गुलाम ही ना सही बंगाल या अवध के नवाब? हैदराबाद का निजाम या हैदर अली और टीपू सुल्तान?

प्राचीन साम्राज्य और सत्ता से आयेंगे? गांधार , गोपाल, या फिर पांचाल?

किरात , कौसल या वज्जि?

शाक्य या चेदि? हैहय ,हरण्यक या मालवा ?

नंद, मौर्य या चोल साम्राज्य?

पांड्य , शुंग या सप्तवाहन ?

अभिरा, सोम, गुप्त, लिछवि, कल्चुरी, श्रीविजय, शैलेन्द्र, चावड़ा,चंद, तोमर, पाल, यादव, उत्पल, बालि?

सिंघासरी, अहोम, यजवपाल, वघेला?

रेड्डी, विजयनगर, गजपति? कोच, गोरखा या डोगरा?

कोई नहीं तो शायद फिर मराठे और राजपूत राजा? शिवाजी, संभाजी, राजाराम? बप्पा रावल, राणा कुंभा, मालदेव, सांगा? या फिर महाराज सूरजमल, गोकळा,राजाराम , चूड़ामन,बदन सिंह? रणजीत सिंह या फिर हेमू? हसन खां मेवाती? गांधी खुद आयेंगे या नेताजी बोस का इंतजार है? नेहरू से तो उम्मीद नही? बाबा साहेब से शास्त्र पढ़ोगे?

कैनिंग, एल्गिन,लॉरेंस, मेयो? रिपोन डफ्रिन,कर्जन, मिंटो? इरविन या सीधा मॉउंटबैटन?

बताओ किस से पढ़ोगे?

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कौन सा इतिहास का व्यक्तित्व या क्या परिस्थिति बनें और आखिर कौन है वो जो तुम्हे खुद से किताब उठाने को प्रोत्साहित कर देवे? क्या आपके इतिहास का शिक्षक फेसबुक या वहाट्सप्प की कोई पोस्ट या आपकी मेज या अन्य पुस्तकों के साथ रखी कोई पुस्तक? क्या आपने उस पुस्तक के अतिरिक्त उसी विषय पर कोई अन्य पुस्तक पढ़ीं? क्या आपने अपने विचारों के विपरीत विचार और विचारकों की पुस्तकें पढ़ी या उनके वक्तव्यों को सुना है। क्या किसी भी प्रकार का निष्कर्ष जो आपने स्वविवेक से निकाला है वह कितना पूर्वाग्रहों से वंचित, राजनीतिक पक्ष-विपक्ष, भावनात्मक और तथ्यात्मक है क्या आपने इसका विश्लेषण किया है? क्या आपको अरुंधति राय और इम्तियाज अहमद के तर्क तो तर्क लगते है पर सीताराम गोयल और दत्तोपंत ठेंगडी के विचारों को सुनने और लेखनी को एक बार पढ़ने का भी समय नहीं है? या आपको अगर हर वैज्ञानिक तार्किक व्यक्ति आपकी धर्म संस्कृति के विरोध के स्वर में बात करता प्रतीत होता है?

अथाह ज्ञान और सीमित जीवन है और यह चुनाव आपको और हमको करना है कि क्या हम कुंठित, अल्पज्ञानी , बड़बोले और संकीर्ण वैचारिकता वाले समाज का निर्माण करना चाहते है? या फिर स्वस्थ वाद संवाद की परम्परा का निर्वाह करने वाले बौद्धिक समाज का निर्माण करना चाहते है। क्या इस कार्य के लिए हमारे सामाजिक कारीगर चाहे वह प्राथमिक शिक्षक हो या फिर शोधार्थी कठिन और लम्बी सृजनात्मक प्रक्रिया से गुजरने के लिए तैयार है?

हमारे विद्यालय, महाविद्यालय राजनीति के अखाड़े और हमारे बच्चे अज्ञानी और शिक्षक चयनात्मक अल्पज्ञान रखते है। बहुत तो सच मे इतने अल्पज्ञानी है की अपने विषय से बाहर का संसार या स्वयं के विषय में नवीन शोधकार्य के बारे में वह पूर्ण अज्ञानी है। यही हाल हमारे बच्चों का भी है । मुंह की संख्या बुद्धि से ज्यादा हो चली है और संवाद नष्ट होकर विवाद, घृणा और गाली-गालौच मे बदल गया है। विषय विशेषज्ञ नाम का प्राणी विलुप्त ही समझो क्योंकि आजकल हर पॉडकास्ट पर आनन–फानन इतिहास, कला, दर्शन और येति का आस्तित्व सिद्ध कर दिया जाता है। बुद्धि और सोचने समझने की क्षमता का उपयोग करके निर्णय लेने वाला मामला अब नहीं है। यह सब यूट्यूब और facebook पर गिरवी पड़ा हुआ है।    

तटस्थ वैचारिक और बौद्धिक मार्ग अपनाकर सामाजिक हितार्थ निर्णय लेने वाला मनुष्य बनना है! यही कठिनतम लक्ष्य है।

-m.Dinesh      

Dinesh Mandora All rights reserved ©

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