भूतिया I.I.T.


इस देश का IQ कोई एक दिन में ही नहीं गिरा है! कलेक्टिव एफर्ट है ये पोलिटिकल फिगर्स का, तथाकथित राइट विंग इनफ्लूएंसर और वो चाय की टपरी स्तरीय पॉडकास्ट को दिन भर आपके दिमाग में बस अंग्रेजो द्वारा मिलावट की गई, मुल्लों और आक्रान्तियों द्वारा जला दी गई और लेफ्ट द्वारा छुपा दी गई उस पौराणिक विद्या और ज्ञान की बकवास भरते रहे है जिसपर आपको गर्व करना चाहिए। भले ही उस ज्ञान और विद्या से आपने पिछले 500 सालो में कुछ नहीं उखाड़ा है और पिछले 1000 सालो से आप उस ज्ञान के कारण ही गुलाम रहे और 1200 सालों पहले से उसी ज्ञान की वजह से आपका सैद्धांतिक और सामाजिक पतन होना शुरू हो गया हो पर आप बस उसपर गर्व करते रहे। आप कुछ नहीं करे! कोई शोध नहीं, कोई खोज नहीं, कोई रिसर्च नहीं, कोई नया कारनामा नहीं क्योकि आप बस ऊपर गर्व करे और आपका यही गर्व पर्याप्त है आपको विश्व गुरु बनाने के लिए भले ही आपका सामाजिक ढांचा किसी विष गुरु अर्थात Poison Master जैसा क्यों ना हो जाये।

इस देश को IIT में इंजीनियरिंग पढ़ने की कोई जरुरत नहीं है। समाज वैसे भी सीमित संसाधनों में कुछ काम का बना देने वाले को जुगाड़ी की उपाधि दे देता है और उस cleverness को जो विश्व के प्रत्येक समाज और तबके में जो गरीबी और संसाधनों की सीमितता से प्रभावित है उसको जुगाड़ बोलता है मतलब इंजीनियरिंग पढ़के क्या करोगे? जुगाड़ नाम की टेक्नोलॉजी है तो सही इस देश में जो यहाँ से बाहर नहीं जानी चाहिए। जब जुगाड़ करने सरकार बना लेते हो, नौकरिया पा लेते हो, जुगाड़ करके पानी, बिजली, राशन और बाकि अन्य चीजों का जुगाड़ कर ही लेते हो तो ये जुगाड़ तकनीक लाखों रूपये, सालों की मेहनत, थीसिस, पेपर, कॉन्फ्रेंस, सेमिनार, मिड टर्म, प्रोजेक्ट , एग्जाम और अनेको Sleepless रातों की इंजीनियरिंग से तो ठीक ही प्रतीत होती है।

तो यही जुगाड़ ही ठीक है बाकि IIT जैसे संस्थानों को तो पुनर्जन्म की बात करनी चाहिए क्योकि देखो ये यूरोप वाले जो है इनके सनातन से निम्न स्तरीय अब्राहमिक धर्म में पुनर्जन्म तो ही ही नहीं क्योकि इनको तो इसी जन्म में सब कुक करना होता है। इसीलिए ये लोग बस लगे रहते है की जैसे तैसे करके एक ही लाइफ में जो शोध , खोज , पेपर लिखा जा सके लिख ले और जो ज्ञानार्जन है उसको कर लेते है। अपनी ही नजरो के सामने ही वो लोग बड़े-बड़े इंस्टिट्यूट बनते देखना चाहते है और खुद को नोबल या फील्ड मैडल मिलते देखना चाहते है। उन मूर्खो को पता ही नहीं की अगला जन्म भी तो मिलेगा ? उस जन्म में क्या करेंगे अगर अभी सब कर लिया तो और फिर क्या है जी वेस्ट का जो ज्ञान है वो तो सब यही से चोरी किया गया है। यह सब हमारे धार्मिक ग्रथो और specifically वेदो में लिखा गया है वो ईश्वरीय ग्रथ सब ज्ञान एक भंडार है। क्योकि जब ज्ञान-विज्ञान की बात आती है तो हम इस दुनिया के रंगमंच के राजपाल यादव है "मुझे सब पता है इसको बिलकुल नहीं आता है मैं इसको बिल्कुल सीखा दूंगा।"

BHU में जो भूतविद्या सीखा रहे है क्या यही है वो ज्ञान जो तक्षशिला या नालंदा में जल गया था? तो फिर क्या उनका जल जाना एक श्रेष्ठ काम हुआ? इस मूर्खता को नाम दिया जाता है इंडियन नॉलेज सिस्टम अर्थात IKS और इसी IKS के नाम पर पिछले 5 सालों में इस देश के कितने ही संस्थानों में बेतरतीब और घटिया तरीके से Design किये हुए जाने कितने ही कोर्स चलाये जा रहे है। भूतविद्या, मंत्र सिद्धि, आयुर्वेद और आयुर्वेद में ड्रग बनाना क्योकि मॉडर्न मेडिसिन के टेंडर में तो अब इलेक्टोरल बांड घुस गया है, कौटिल्य का दर्शन जो की एक made up figure जो एक्सिस्ट ही नहीं करता था उसका दर्शन पढ़ाना ज्यादा जरुरी है क्योकि कभी भी Bald शिखाधारी की फोटो के साथ कुछ घटिया नस्लवादी या जातिवादी कैप्शन लिख कर अपना एजेंडा आगे बढ़ाया जा ही सकता है।

AIPSN मतलब All India People Science Network कहता है की यह कोर्स उन लोगो ने लिए एक उत्सव है जो भारतीय और गणितीय इतिहास को ठीक से नहीं समझते है। मैं कहता हूँ की ये वे लोग है जो समझ गए ही की इस झूठ के किले से प्रसिद्धि और पैसा कैसे बनाना है? इनमे से कई तो वो है जिनके पास साइंस या इंजीनियरिंग में डिग्री नाम का कागज भी है, क्योकि ये लोग ये बात तो समझ गए की अपनी फील्ड में तो केवल अपने काम के दम पर प्रसिद्ध हो नहीं सकते है तो समाज का एक जो gullible तबका है जिकी कोई ट्रेनिंग नहीं है लॉजिक और रीजनिंग में क्यों न उनके बीच में ही घुसा जाये! यहाँ से फेम मिलेगा और उस फेम से बनाये पैसा; बाकि देश का कलेक्टिव IQ चाहे कितना ही low हो जाये।

पर इस पूरे प्रकरण में AIPSN ने ये जरूर कहा की यह वेस्टर्न रेसिज़्म के against एक रिवर्स रेसिज़्म है जहा क्योकि इन लोगो में खुद के legit ज्ञान, विज्ञान और इंजीनियरिंग को लेकर हीन भावना है तो इन लोगो ने मनगढंत प्रकार के दावे ठोकना शुरू कर दिया। 

ऐसा ही एक दावा सबसे पहले किया था आर्य समाज एक संस्थापक दयानन्द सरस्वती ने जब उन्होंने कहा की वेद ईश्वर रचित है और आधुनिक विज्ञान तक विश्व का सभी ज्ञान आपको वेदो में ही मिल जायेगा। उस एक आदमी ने इस देश का कलेक्टिव साइंटिफिक consciousness उसी वक़्त 200 साल पीछे धकेल दिया था और आज भी उसका भुगतान हम एक समाज के रूप में कर रहे की हमारे पास एक समाज के रूप में कोई एथिक्स नहीं है और सोसाइटी 15वी शताब्दी की नैतिकता के आधार पर चल रही है। आज भी हमारे आर्ग्यूमेंट्स और झगडे मोरल v/s एथिकल के ही है।

साल भर पहले की मैंने एक Reddit पोस्ट देखी जिसमें एक यूजर ने लिखा मैं NIT में पढ़ रहा हूं और जब मैंने पहली बार यहां के शोधकर्ताओं के बारे में सुना, तो मुझे लगा की किसी भी प्रकार के छद्मविज्ञान को यहाँ पर प्रोत्साहित नहीं किया जाता होगा पर मैं गलत था। 

ऐसी कई घटनाएं हुई हैं उदाहरण के लिए कुछ दिन पहले ही हमारी क्लास कैंसिल कर दी गई क्योकि प्राचीन भारतीय ज्ञान एक ऊपर व्याख्यान देने के लिये किसी अतिथि को बुलाया गया था। वह वक्ता भारद्वाज के वैमानिक शास्त्र से प्रेरित थे जिन्होंने कई दावे किये की जैसे:

  • मंदिरों में बहुत ज़्यादा सकारात्मक ऊर्जा होती है अर्थात पॉजिटिव एनर्जी होती है।
  • बिग बैंग से "ॐ" की ध्वनि उत्पन्न हुई थी
  • हल्दी से कैंसर ठीक हो जाता है
  • हनुमान चालीसा में सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी बताई गई है

और सबसे चौकाने वाली बात यह थी की किसी ने उनसे कोई सवाल नहीं किया। मेरे दोस्तों ने उनकी हर बात पर यकीन कर लिया और उन्हें इस ज्ञान पर गर्व था।

They were not prepared for any criticism, and I still can't believe it.

NIT में पढ़ने वाले छात्रों का यह हाल है तो सोचिये वहाँ के प्रोफ़ेसर का क्या होगा? सोचिये की जब यह Reddit यूजर कल को वेस्ट में जायेगा और वापस से साइंटिफिक थिंकिंग में उसकी ट्रेनिंग होगी तब क्या होगा? आपके बच्चे विदेशो से जाकर ब्रेन डेड(BRAIN Dead ) नहीं होते है। ब्रेन डेड तो उनका यहाँ होता है विदेशो में जाकर उनका ब्रेन गेन होता है। उनके मरे हुए मस्तिष्क में जान आ जाती है और समझते है की कैसे systematically एजुकेशन सिस्टम ही उनकी तरक्की में सबसे बड़ा दुश्मन है।

इसीलिए भौतिकी मेडिसिन और केमिस्ट्री यहाँ तक की फील्ड मैडल एक भी भारत के वैज्ञानिक़ो को भारत में रहते हुए नहीं मिला है।

और हद यह है "ब्रेन डेड" करने की के IIT-NIT में पढ़ने वाला बच्चा कोई लॉजिकल काउंटर करने में समर्थता नहीं जाता रहा है क्योकि वह यह करना नहीं चाहता है। वह खुद भी आँख बंद करके इसको मान लेना चाहता है की जो एक साइंटिफिक अनपढ़ व्यक्ति मुझे देश के प्राचीन विज्ञान के बारे में बता रहा है वही सही है।

आज आप यूट्यूब पर जाओ तो आपको भर-भरकर अंधविश्वास फैलाते हुए पॉडकास्ट, वीडियो, astrologer और palm रीडर मिल जायेंगे। लोग इनको लाखों करोडो की संख्या में देख रहे है जैसे की सहारा देश वापस से भाग्यवादी हो गया है। दिन भर गीता गीता की रट लगाने वाले शायद गीता के कुछ पेज से आगे नहीं पढ़ पाते है इसीलिए शायद कर्म पर किये Emphasis को भी पढ़ लेना चाहिये। शायद आपको लॉजिक और रीजनिंग में ट्रेनिंग लेनी चाहिए।

कुछ दिन पहले आचार्य प्रशांत को यह कहते हुए सुना था "वेस्ट के विश्विद्यालय तीर्थ की तरह है और अगर हमारे मन में जरा भी सम्मान ज्ञान के प्रति होता तो हम वैसे ही तीर्थ हमारे यहाँ भी बनाते।"

मैं कहता हूँ चाहे तीर्थ का जो भी मतलब यह देश निकालता हो वेस्ट के विश्व विद्यालय तीर्थ तो नहीं है। तीर्थों के नाम पर इस देश ने जितना पाखंड किया है और विश्व भर में फैलाया है अगर उन्हें तीर्थ बोल देंगे तो शायद वहाँ भी यह लोग अपने झोला झंडी उठा कर लेकर चल देंगे और तीर्थ छोड़िये अगर ढंग एक प्राथमिक विद्यालय बनाने में भी हम सफल हो जाते है तो यह निश्चित है हम में ज्ञान के प्रति सम्मान और उम्मीद की किरण बाकि है।

माँ सरस्वती ज्ञान की देवी जरूर है पर मैं यह surity के साथ कह सकता हूँ की वह इस देश के शिक्षण संस्थानों में निवास नहीं करती है। उनकी कितनी ही पूजा या पुष्प अर्चना वसंत पंचमी पर इस देश के स्कूल कॉलेज या यूनिवर्सिटी कर ले पर वह उन इमारतों की तरफ नजर उठा कर भी नहीं देखती है।

सरस्वती विचरती है देश के हजारों घरो में बने हजारो छोटे-छोटे पुस्तकालयों में, हजारों पढ़ने के कमरों में और उन चर्चाओं और वार्तालापों में जहाँ एजेंडा, जिद, बहस, लड़ाई और एक दूसरे को नीचा नहीं दिखाया जाता है और जहाँ कई सारे अधजल गगरी मिलकर एक दूसरे पर ही छलक नहीं रहे होते है। सरस्वती वहाँ आसन ग्रहण करती होंगी जहाँ आपसी समझ के आधार पर समसामयिक मुद्दो पर चर्चा होती है। वरना कितनी ही महिलायें केवल इसीलिए पी.एच.डी छोड़ देती है क्योकि उनके गाइड को उनके सबमिशन से ज्यादा उनके कपड़ो के अंदर क्या है उसमे रूचि होती है।

अब अगर आप इस लेख के इस हिस्से तक आ ही गये है तो आइये आपको एक बार भारत के यूट्यूब सनातन धर्म के दर्शन करवाते है। भारत की खोज दिखाते है की कैसे यह सिद्ध पुरुषो और पुरुषिणियो का देश है जहा मंत्र मार के हर समस्या का समाधान किया जा सकता है। समस्या का ऐसा समाधान तब होता है जब पेट में अब 2 रोटी जाने के बाद थाली में एक एक्स्ट्रा रोटी बच जाती है। तब एक समाज जो मॉडर्न tech का इस्तेमाल तो करता है पर दिमाग से अभी भी feudal है वो समाज उसी तकनीक का सहारा लेकर ऐसी सड़ी हुई छद्म तरक्की करता है।  इसीलिए मैंने अपने एक लेख में एक बार कहा था की भारत बड़ा विकृत देश है ये आधुनिक विज्ञान और तकनीक का  उपयोग अपने आप को हजार साल पीछे लेकर जाने के लिए करते है। दुनिया में ऐसे मुल्को की कमी यही है पर भारत विरला है क्योकि यहाँ इस पिछड़ेपन पर हर कदम पर आपको फर्जी गौरव और मिथ्या सम्मान दिया जायेगा।

m.दिनेश© 

-Dinesh Mandora     

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