क्या विज्ञान अंधविश्वास को बढ़ावा दे सकता है?

क्या विज्ञान अंधविश्वास को बढ़ावा दे सकता है?


क्यों ना इसमें एक बात और जोड़ दी जायें की क्या विज्ञान विश्वास को बढ़ावा देता है ?

बिल्कुल नहीं । विश्वास, अंधा-विश्वास, अविश्वास और कुमार विश्वास किसी का भी विज्ञान से कोई लेना देना नहीं है।

हवा-पानी, जीवन-बीमारी-मृत्यु, सूर्य,चंद्रमा, मोबाइल, रेडियो तरंग,परमाणु, फोटोन इत्यादि में आप विश्वास नहीं करते हो यह सब वैज्ञानिक और प्राकृतिक सत्य है। कल को कोई विद्युत चुम्बकीय विकिरण के अस्तित्व को ना माने तो क्या फर्क पड़ जायेगा ? उनके मानने या ना मानने से या फिर किसी के भी ना मानने से कभी कोई वैज्ञानिक तथ्य नही बदल जाता है। 

कल को कोई कहे में साँप का काटा मेरे बाबा या पीर जी के दिए बीजमंत्र और ताबीज से छुवाकर सही कर दूंगा तो यह उनका व्यक्तिगत मामला है, क्या मौत विश्वास करने से  रुक जाएगी ? कैंसर फैक्ट है विश्वास नहीं।

अगर किसी को अपनी माँ की बातों पर विश्वास नहीं की उसके मौजूदा पापा ही उसके पापा है तो डीएनए जाँच करवा लीजिये। अगर जांच में मैच नहीं होने पर भी मम्मी इस बात पर टिकी रहे तो वह व्यक्ति विश्वास करेगा ? या वैज्ञानिक सबूत का चुनाव करेगा? और अगर जाँच में 100% मिलान के बाद भी वह व्यक्ति अड़ा रहे की ये मेरा पापा नहीं है पड़ोस का रंजन अंकल मेरा पापा है तो उसको "मानसिक मदद की जरुरत है और अब ये फैक्ट बन गया, विश्वास नहीं है।

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विज्ञान जब किसी समस्या से रूबरू होता है तो वह सर्वप्रथम अवलोकन करता है, अवलोकन से परिकल्पना करता है, परिकल्पना को चुनौती देने के लिए प्रयोग निर्माण करता है। उस प्रयोग से प्राप्त आंकडो और नव अवलोकन की कसौटी पर परिकल्पना को जाँचता है। यदि परिकल्पना प्रयोगिक आंकडो से सम्मत है तो एक नया सिद्धांत या नियम हमारी वैज्ञानिक समझ का एक भाग बन जाता है। यदि प्रयोगिक ज्ञान के समक्ष परिकल्पना अपना आधार मजबूती से नहीं रख पाती तो निश्चित परिकल्पना में मौलिक सुधार की आवश्यकता है । इस सुधार के उपरांत भी अगर परिकल्पना नहीं टिक पाती तो फिर उस परिकल्पना को खारिज कर दिया जाता है और वापस नया सिरे से प्रकृति का अन्वेषण किया जाता है।

यही वैज्ञानिक अनुसंधान की आधारभूत विधा और विधि है। इसमें कही भी विश्वास अविश्वास की बात ही नहीं है । तथ्यात्मक और प्रयोगिक निष्कर्षों में भावनाओं -चुनाव और विश्वास अंधविश्वास का कोई लेना देना नहीं है विज्ञान Gander fluid या फिर ऐसी ही कोई अन्य मूर्खता नहीं है। अब कोई मनुष्य कहे कि वह सूर्य को मध्यम तारा नहीं बल्कि देवता मानेगा जिसे एक अन्य देवता ने निगल लिया था या किसी के धर्म में भगवान का दूत उड़ने वाले घोङे पर बैठकर जन्नत गया था या ईश्वर का बेटा मृत्यु के तीन दिन बाद कब्र से उठकर वापस पापा के पास चला गया और यही सत्य है तो यह उनका व्यक्तिगत विश्वास या व्यक्तिगत सत्य हो सकता है पर यह ना वैज्ञानिक है ना ही तथ्य है।

मान्यताओं और विश्वास का ही नहीं अपितु अंध–विश्वास का भी मूल है प्रश्नात्मक स्वभाव का दमन करना। आप इस्लाम को लिजिए विश्व भर के मुसलमानों में एक बात समान है कि अपनी धार्मिक मान्यताओं और पुस्तकों को लेकर उनमें एक बौद्विक ठहराव घर कर गया है। यह ठहराव सभी अन्य धर्मों में भी है परंतु इस्लाम इस मामले में विशेष है। यह ठहराव मूल रूप से वर्तमान इस्लामी शिक्षकों, बुद्धिजीवी अध्ययनकर्ता और शिक्षकों में व्याप्त है। एक और जहाँ सामान्य मुस्लिम अपने धार्मिक मत और विश्वास को तार्किकता के तराजू में तौलने के लिए निकलता है वही दूसरी और ये इस्लामी विद्वान उन्हें अपने तर्क केवल धार्मिक पुस्तकों के रूप में प्रस्तुत करते है। उनका मूल है की सामान्य व्यक्ति के मस्तिष्क मे धार्मिक ग्रंथों के मे लिखी बातों के बारे मे उठने वाले मौलिक प्रश्न दरअसल शेतान द्वारा परम ईश्वर के विरुद्ध किया जाने वाला कार्य है। एक मुसलमान को बिना कुछ सोचे समझे मूलतः अक्षरक्ष धार्मिक ग्रंथ मे लिखी बात को मानते रहना चाहिए। 

यहाँ तक की विभिन्न वाद-विवाद मंचों पर भी यह इस्लामी विशेषज्ञ अधिकतर केवल बोलने आते है, वैज्ञानिक पक्ष को सुनने से इनका कोई लेना-देना नहीं होता है। किसी 500 लोगों के जनसमूह में अपने पूर्वाग्रही कुतर्कों सें बस किसी प्रकार  5 से 50 लोगो का धर्मातरण करवा लिया जाये यही वहाँ जानें का छुपा हुआ मूल प्रयोजन होता है।

यह उपरोक्त बात केवल इस्लामी ही नहीं अपितु अन्य ईसाई धार्मिक शिक्षकों के लिए भी है। वह भी अधिकतर चमत्कारों और छद्मवैज्ञानिक कुतर्को का सहारा लेते है। इनका प्रभाव यह है की किसी अ-वेज्ञानिक बात को पढ़कर उठा मूल प्रश्नात्मक विचार धर्म के सामाजिक प्रभाव के बोझ तले दबा दिया जाता है।  

वर्तमान में सभी धर्म चाहे हिंदू , मुसलमान अपने और अपनी किताबों को वैज्ञानिक और विज्ञान सम्मत सिद्ध करने पर तुलें हुए है। यह मूलतः अपने अस्तित्व और प्रासंगिकता को बनाये और बचायें रखने के लिए है। यह सोचना वर्तमान और आने वाले कई दशकों तक मूर्खता होगी की धर्म से निजात पाई जा सकती है। धर्म घर्षण की प्रकार मानव जीवन में एक आवश्यक दोष है। यह हमेशा किसी ना किसी रूप में मनुष्य और सभ्यता के साथ बना ही रहेगा। इसकी सामाजिक आवश्यकता इसकी व्यक्तिगत आवश्यकता सें सदैव अधिक रहती है। आप अपना पूरा जीवन एक भी धार्मिक रिति रिवाज और नियम को ठीक से ना निभाते हुए या फिर बिना निभाये भी बिता सकते है पर सामाजिक संरचना में जुड़ने और मौजूद रहने के लिए आपको धार्मिक स्वीकृति को आवश्यकता रहती ही है। सामान्य व्यक्ति इस संरचना से दूर -इसिलिए नहीं छिटकता क्योंकि धर्म और रिवाजों ने उसको कसकर जकड़ा हुआ है । वह हिम्मती नहीं है और उसको अपनी बेड़ि.या तोड़नी नहीं आती है। मनुष्य भागना नहीं चाहता है इन सबसे क्योंकि उसको यह सामाजिक ढ़ाचा प्रिय है। वह इसमें रहना चाहता है और इसका एक भाग बने रहना चाहता है। उसके लिए यह उसकी मजबूरी नहीं आवश्यकता है। अपने अतिरिक्त किसी बड़े. समाज किसी कार्य या किसी संगठन का भाग होने का अहसास होना मानव वृद्धि के लिए आवश्यक है। वर्तमान तथाकथित पश्चिमी नास्तिक विचारकों को ये बात समझनी पड़ेगी और धार्मिक मूर्खता से लड़ने की अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा। 

Scientific facts does not Care about you and your feelings, opinion, Background or your Religious Books.

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-m.Dinesh      

Dinesh Mandora All rights reserved ©

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Comments

  1. Great 👍👍👍 अच्छा initiative है किंतु कुछ भाषाई त्रुटियों का विशेष ध्यान रखना होगा। की और कि में बहुत अंतर होता है। यह ट्रांसलेशन की धज्जियां उड़ा सकता है। बाकि आपके बौद्धिक और वैज्ञानिक ज्ञान के निष्पादन का कहना ही क्या। काबिले तारीफ़।

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