नास्तिक हो या Atheist ?
क्या तुम कभी ऐसे व्यक्ति से मिले हो जो कहता है मैं भी पहले नास्तिक था लेकिन और उसके बाद उसने जो भी कारण बताया वो मैंने सुना नहीं क्योकि मैं उठ के चला जाता हूँ। मैं ऐसे गजोधर लोगो से कोई बातचीत नहीं करता हूँ क्योकि तुम कभी भी नास्तिक नहीं थे तुम बस अपनी मोर्टल समस्याओ से ग्रसित थे। तुमने माँगा तुमको मिला नहीं तो तुम को किसी भी भगवान् पर विश्वास नहीं। ऐसा लड़कपन का धार्मिक विश्वास या श्रद्धा श्राद्ध पक्ष की तरह होती है। ग्रह बदले श्राद्ध पक्ष खत्म ! Do you really think की किसी भी भगवान को इस तरह के किसी भी विश्वास की कोई आवश्यकता है? ऐसे तथाकथित पूर्वर्ती नास्तिक के पास तर्क नहीं होते क्योकि उनकी लॉजिक और रीजनिंग में अच्छी या दोयम स्तर की ट्रेनिंग भी नहीं हुई होती है। लगभग सभी आस्तिकों, नास्तिकों, पूर्वर्ती आस्तिकों, भूतपूर्व नास्तिकों इत्यादि का जीवन चक्र Burdon of Proof लॉजिकल fallacy के भरोसें घिसट रहा होता है अर्थात मैंने तो स्टेटमेंट दे दिया है अब समस्या है कि सामने वाला स्टटेमेंट के विरोध या समर्थन में तर्क या एविडन्स प्रस्तुत करे।
मैं धार्मिक मामलों पर टिप्पणी नहीं करता हूँ क्योकि अधार्मिक लोग गाली-गलौच पर उतर आते है। मैं तुम्हारे किसी भी भगवान, खुदा या जीसस में कोई श्रद्वा या विश्वास भी नहीं रखता हूँ। मेरी किसी भी भगवान् या परम शक्ति को लेकर को लेकर कोई निजी अवधारणा नहीं है क्योकि
Gott ist tot! Gott bleibt tot! Und wir haben ihn getötet!“
-Friedrich Nietzsche
(Die Fröhliche Wissenschaft)
मेरी भगवान की व्यक्तिगत अवधारणा कुछ नहीं है क्योकि उसकी मृत्यु हो चुकी है। भगवान की भी और किसी छदमविज्ञान अध्यात्म की चाशनी में परोसी गई बदबूदार woke अवधारणा की भी और आपको मेरी अवधारणा पसंद भी नहीं आएगी क्योकि मैं सोचता हूँ गहरा और लिखता हूँ उथला तो अब आगे जो पढ़ो उसको Tip of the Ice berg समझकर पढ़ना। वैसे भी मैं कौनसा मनोरंजन करने के लिए लिखता हूँ।
देखो मैं नास्तिक नहीं हूँ और Atheist होना और नास्तिक होना दोनों शब्दों और बातों में जमीन आसमान का फर्क है। तुम कभी मुझे सुनोगे या पढोगे तो तुमको लगेगा क्योकि मैं जरूर कभी-कभी Atheist जैसी बातें कर देता हूँ पर इसका सीधा मतलब है की
I maybe advocating the absence of 'belief in the existence of any kind of natural deities or a supernatural phenomenon' while providing sufficient arguments, hypothesis, Physical law and experimental data against the idea 'that universes is governed by a primordial celestial entity' rather than the law of Math, Physics and Thermodynamics which on the quantum scale handle and delicate balance of the four vector universes literally exceptionally but expectedly perfectly.
ये थोड़ी चतुर 'साइलेंसर' रामलिंगम लेवल की बात हो गई क्या? अर्थात आपके और मेरे नजरो में भगवान् का बेसिक कांसेप्ट बिल्कुल अलग है। ब्रह्मांड को बनाये रखने के लिए किसी भी भगवान/खुदा/गॉड की आवश्यकता नहीं है क्योंकि काम्प्लेक्स मैथमेटिकल एंड फिजिकल लॉ यह काम बखूबी कर रहे है। जहाँ जहाँ ह्यूमन Knowledge अर्थात मानवीय वैज्ञानिक समझ में गैप है उसको इस्तेमाल करके यह कह देना की देखो ये तो निश्चित भगवान ने किया है या यह भगवान् के अस्तित्व का सबूत है इसको हम फिलॉसोफी में God of the Gaps fallacy कहते है।
मुझे किसी के भगवान से कोई लेना-देना नहीं है क्योकि किसी के भगवान को मुझसे कोई लेना-देना नहीं है। हमारा एक दूसरे के बिना बढ़िया काम चल रहा है। क्योकि तुम्हारा वाला भगवान मुझे कुछ नहीं दे सकता है और सच कहू तो वो तुम्हे भी कुछ नहीं दे सकता है। ये कैसा भगवान है जो नौकरी, पैसा, प्रतिष्ठा, पद, शादी-ब्याह, जमीन जायदाद और गृह कलेश के मुक़दमे देखता है? बड़ा मुंसिफ कोर्ट सरीखा मामला है। खैर मैं तुम्हारे अंधेपन पर कोई टिप्पणी नहीं करूँगा, मुझ काणे ने राजा होकर कोनसा कुछ उखाड़ लेना है।
मेरे घर में भी पूजा पाठ होता है, रिचुअल होते है और मैं उनमे बैठता हूँ, एन्जॉय करता हूँ क्योकि वह संस्कृति का हिस्सा है। संस्कृति और धर्म मैं फर्क तो समझते ही हो ना आप ? मैं मेरे माता पिता या मित्रों के धार्मिक विश्वासों पर टीका टिप्पणी नहीं करता हूँ क्योकि यह यह उनका व्यक्तिगत चुनाव है। मेरा व्यंग करना या टिप्पणी करना बनता भी नहीं है। वो प्रसाद बोलकर देते है मैं मिठाई समझकर खा लेता हूँ। कोई मंदिर में घुसने को बोलता है मैं चप्पलों देखभाल का बहाना करके बाहर रुकता हूँ। माँ लोटा पानी शिवलिंग पर डालने को बोलती है मैं पानी की किल्लत का सामान्य तर्क देकर मना कर देता हूँ।
मैं ये नहीं कहता हूँ की मम्मी शिवलिंग और जल जिस दार्शनिक मूल का प्रतीक है पत्थर पर पानी डालकर आध्यात्म प्राप्त करने का लक्ष्य ही अनुचित और बेमानी है। माँ के लिये शिवलिंग ही भगवान् है, मेरे लिए माँ का मानसिक सुख कीमती है पर मेरे लिये Scientific understanding of universe and Nature, Scientific Temperament. True Rationality and Logic मेरा धर्म है और मैं अपने धर्म से विमुख हुआ तो जाहिर है अपने आप को ही खो दूंगा।
महान दार्शनिक श्री कृष्ण ने कहा है ना
श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ||
[Better is one's own duty, though devoid of merit, than the duty of another well performed. He who does the duty ordained by his own nature incurs no sin.]
(Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 47)
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तो देखो भाई मेरा तो जैसा भी भौतिकवादी है मेरा धर्म मुझे प्रिय है और मेरा तो सनातन भी नहीं है दरअसल ये तो धर्म भी नहीं है हम तो मानव के सोचने और अन्वेषण करने का तरीका है। अभी 14वी सदी मैं डार्क Age के बाद ही यूरोप में उत्पन्न हुआ है। हमारी कोई एक फिक्स किताब नहीं है बहुत सारी है मतलब कई हजारों और Peer रिव्यु आर्टिकल और पेपर भी हर दिन हजारों छपते है तो कितने पढ़े? बंदा अथाह ज्ञान से परेशान है। फिर हमारे भी यहाँ सैकड़ो फिरके है फिजिसिस्ट, केमिस्ट, गणितज्ञ, जियोलॉजिस्ट(ये शब्द पढ़कर शेल्डन कूपर चिढ़ जाता) और हमारे मजदूर जिनके बिना ये बाकि के फिरको का जीवन दुश्वार हो जावे हमारे इंजीनियर वो भी मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल जाने कितने सारे और बिना एक दूसरे के हमारा कोई काम चलता ही नहीं है। कभी कभी टांग जरूर खींच लेते है एक दूसरे की ... पर रहते मिलकर है। हमारा कोई नबी नहीं है कुछ शख्स है जिनकी हम बड़ी इज्जत करते है क्योकि उन्होंने नई और अलग राह दिखाई इसीलिए रोजाना उनके काम को गलत सिद्ध करने या उसमे कुछ कमी निकालने का प्रयास जारी रखते है। कोई यहाँ छोटा बड़ा नहीं है जो एक्सपेरिमेंटल एविडेंस लायेगा उसकी सुनेगे जो केवल बोलेगा उसको सीरियस नहीं लिया जायेगा।
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मैं धर्म या भगवान के डोमिन में नही घुसता हूँ क्योकि यहाँ काम विश्वास पर चलता है क्योकि तुम बहुत सिंपल analogy पर जीते हो 'कह दिया मान लो नहीं मोनोगे तो तुम वेलकम नहीं हो।' ये किसी बात हुई? लेकिन मेरे नजदीक बैठकर तुम गपोड़बाजी करोगे की कैसे प्राचीन काल में मंत्रो से आग पैदा कर देते थे, तुम्हारे नबी ने चाँद के टुकड़े कर दिए या उड़ने वाले खोते(गधा) पर बैठ कर जन्नत चले गए या कैसे तुम्हारे लोगो ने बिना नेचुरल फिजिकल नियमो के बिना ही पुष्पक विमान बना लिया या टाइम ट्रेवल कर लिया या फिर डार्विन का सिद्धांत दे दिया, महाभारत में परमाणु बम चला दिया, महावीर के जन्म के समय हीरे मोती की वर्षा हुई थी , बुद्ध के 550 जातक कथाये उनके पुराने जन्म थे और अब कलियुग है इसके बाद सृष्टि का नाश होगा तो मैं वहाँ से उठ कर चला जाता हूँ। मुझे पसंद नहीं की धर्म विज्ञान के डोमेन में घुसे। यार तुम बड़े Insecure हो तुमको साइंस से वेलिडेशन भी चाहिये लेकिन उसको स्वीकार भी नहीं करना है और ये साइंस का उपयोग करके साइंस को गरियाने को हम Fallacy of Selective Attention मतलब Cherry Picking fallacy कहते है पर इसके बारे में मैं अभी बात नहीं करना चाहता हूँ कभी विस्तार से लिखूंगा।
इसीलिए मुझे लगभग बहुसंख्यक So called Religious लोगो पर दया भी नहीं आती है जिन्होंने ना धर्म ठीक से पढ़ा ना ही विज्ञान ठीक से पढ़ा है। दोनों ही ठीक से नहीं पढ़े और ना ही समझे है इसीलिए ऐसे लोग हमेशा ही डरे हुए, आशंकित और कुंठित रहते है। दूसरे धर्म या संस्कृति से सदैव ही खतरा महसूस करते है। किसी भी बात से आतंकित हो उठते है। ऐसे मनुष्य का धर्म हो या दीन हमेशा ही खतरे में रहता है। ऐसा कोई मिले तो उसको जादूनाथ सिन्हा की किताब भारतीय दर्शन देना और J.J. Sakurai की आधुनिक क्वांटम मैकेनिक्स की किताब भी देना और कहना किसी एक किताब को 100 बार पढ़ ले सारे डर निकल जायेंगे।
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मैं समझ नहीं पाता हूँ की भगवान् के जो निकट है ऐसा आदमी डर कैसे सकता है?
या तो तुम विज्ञान के सिपाही हो और तुम नहीं डरते हो चाहे जिंदा जला दो क्योकि मैं यही कहूंगा धरती सूर्य के चारो और घूमती है। चाहे मैं न्यूटन होऊंगा दुनिया का प्रख्यात और महान गणितज्ञ और मुझे बाइबिल पूरी याद होगी क्योकि मैं समझता हूँ ईश्वर निश्चित ही कोई गणितज्ञ है इसीलिए मैं उसको उसी की भाषा में समझूंगा। या फिर मैं मेघनाद साहा बनू की मुझे ही उस मंच से नीचे उतार दिया जिसपर सरस्वती पूजन हो रहा था जबकि मुझपे ही उस देवी की सबसे असीम कृपा थी।
या फिर एक आध्यात्मिक आदमी, धार्मिक आदमी नहीं क्योकि धार्मिक तो डरता है और दरअसल डर ही उसका भगवान है। उसका असली भगवान् से कोई लेना देना नहीं है वो तो Afterlife में VIP सीट बुक करने के लिए कोशिश करता है चाहें जो भी करता है अब वो चाहे चंदा देना हो या पूजा पाठ करना है यहाँ तक की भगवान के नाम पर खून पीना या गुरु भक्ति के नाम पर स्त्री की अस्मिता से खिलवाड़ करना हो। जबकि आध्यात्मिक आदमी डरता ही नहीं है चाहे जो हो जाये! उसको कैसे डरा दोगे? उसके पास तो भगवान है ही। अब वो भगवान् उसको श्रीमद भगवद गीता से मिला है या कुरान से मिला है या बाइबिल से या फिर ग्रंथ साहिब से या फिर बुद्ध की शरण में जाने से या फिर महावीर को प्रमाण करने से या फिर शिवलिंग पर पानी चढ़ाने से उस से कोई लेना-देना नहीं है।
ऐसा सरल चित्त हो जाना क्योकि जानते हो तुम्हारा तो तुम्हारे साथ है ही। ओशो बोलते तो है तुमसे ज्यादा कोई विशेष है ही नहीं; ना बुद्ध और ना ही महावीर और ना ही क्राइस्ट तुमसे ज्यादा विशेष है। तुम साधारण कहा हो ?
मैं भी तो यही कह रहा हूँ : प्रेम तो तुम में से फूटता है ,आंसू बनकर बहता है और हँसी बनकर उमड़ता है। तुम भीतर से शांत हो जाओ तो किसी बाहरी भगवान की आवश्यकता नहीं है पर तुम तो भीतर से ही चक्रवात हो तो बाहर भी सब कुछ नष्ट करते चलते हो।
महावीर को देखो और पैरों मैं गिर जाने का मन ना करे तो अभी तुम बहुत दूर ही हो , बुद्ध को देखो और बुद्धू बनने की ललक ना उठे तो अभी तुम्हारा सफर शुरू भी नहीं हुआ है। किताब कोनसी है इस बात से कोई फर्क नहीं पढता है भीतर कौन बैठा है ये तो अपने आप से पूछ लो एक बार।
तुम घोर नास्तिक हो सकते हो तुम्हे बुद्धू बनने का मन कर सकता है इसमें हर्ज ही क्या है?
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अगर तुमको लगता है कि किसी भगवान पर विश्वास नहीं करना या किसी धर्मग्रंथ के ऊपर भद्दी टिप्पणी कर देना ही नास्तिकता है तो देखो मित्र, अभी तुम नास्तिकता से बहुत दूर हो और भारतीय दर्शन की नास्तिकता तो तुम कभी समझ ही नहीं पाओगे। हाँ, ज्यादा से ज्यादा कुछ और किताबें किताबें पढ़कर तुम एक शब्द Atheist को उपयोग में ले सकते हो। ये मैंने इसलिए कहा क्योंकि दोनों शब्दों के मूल अर्थ बहुत अलग है। नास्तिकता दार्शनिक है Atheism तार्किक और ऑबजेक्टिव विचार है। जैसे जैनों का दर्शन, बुद्ध का दर्शन, चार्वाक का दर्शन ये नास्तिक दर्शन है लेकिन Atheist नहीं है यह यूरोप का उत्पत्ति है। वेबर की, निष्ते की, देकार्त की, कार्ल मार्क्स की उत्पत्ति है। ऐसा दर्शन Dawkins, Dennett, Hitchens और Harris पैदा करता है। दोनों के नकार में मूल भाव ही अलग है।
मैं तो हँस पड़ता हूँ जैनों को महावीर जयंती पर स्वांग रचते देख कर और मैं मुस्कुराकर आगे बढ़ जाता हूँ तथाकथित नव बौद्धो को हिन्दुओ पर कटाक्ष करता देख कर, मुझे आश्चर्य होता है इस्लाम को गाली देने वाले सनातनी हिंदू देख कर और बाइबिल को जलाने वाले मोमिन देख कर और कैसे तुम सनातन (Ancient ) संस्कृति को झुठलाकर केवल खुद को सच्चा और एकमात्र दीन होने का दावा ठोक सकते हो ? तुम कैसे इंसान हो जब तुम कहते हो की अल्लाह की मर्जी के बिना एक पत्ता नहीं हिलता है और तुम समझ नहीं पा रहे हो की पूरी दुनिया ही तुम्हे गरिया मार और दुत्कार रही है क्योकि ये अल्लाह है जिसने देखा की उसका मोमिन कितना बेगैरत, बेआबरू और जाहिल हो गया है और ये उसकी मार है ये उसकी छड़ी है जो तुम पर जो ताबड़ तोड़ पड़ रही है।
ऐसा बेगैरत और झूठा पतित समाज तो ऐसा वैज्ञानिक भी ऐसा ही पैदा करेगा जो वैज्ञानिक कर्मकांड करते मिलेगा या ऐसा समाज अपने एकमात्र वैज्ञानिक को लात मारकर देश से निकल देगा क्योकि वो अहमदिया फिरके का मुसलमान था। इतनी जहालत भर जाती है इन लोगों में की एक दूसरे को नीचा दिखा कर मार काट कर और नष्ट कर देने के नाम पर ये अपनी पीढ़िया भी ख़राब कर लेते है वर्तमान तो इन्होने फूँक ही दिया होता है। आज का कुछ नहीं पढ़ेंगे और जो बीत गया उसपर कबड्डी खेलते रहते है। ये वही तबका है जो सालों पीछे जाना चाहता है और सबको अपने साथ धकेल कर ले जाना चाहता है। आज अगर मैं तुमसे कहू तो तुम थोड़ी अक्ल चलाना और सोचना की मेने ऐसा क्यों कहा? एक आम भारतीय हिंदू (हिन्दू मत कहो इन्हे सनातनी कहो आजकल इनको आइडेंटिटी क्राइसिस हो गया है) तो एक सामान्य शिक्षित कॉलेज डिग्री प्राप्त हिंदू की समसामयिक वैज्ञानिक समझ के मूल विचार(Basic ideas of contemporary scientific understanding) अभी भी 18वी सदी के उत्तरार्ध में है। एक भारतीय ईसाई 1920 के आस-पास है और बुद्धिस्ट और जैन बहुत रेलेवेंट है वो 1.5-2 दशक ही पीछे है इनके स्कॉलर्स का जैन धर्म में आधुनिक विज्ञान पर कई किताबे है पढोगे तो लगेगा की ये है वही 2000-2005 में ही है। एक आम भारतीय Sikh 15वी सदी के अंत में ही जी रहा है। बाकि मुस्लिम यहाँ का हो या दुनिया भर का ये सब अभी भी 1338 साल पहले ही में ही जी रहे है। इनको अभी भी लगता है इस्लाम को दुनिया पर काबिज करने के लिए कोई जैश-ए-इस्लामी का गठन करना जरुरी है। क्या ही कहे इनकी जड़बुद्धि का तो . . .
और मैं बहुत वैज्ञानिक रूप से लीर लीर कर सकता हूँ तुम्हारे किसी के भी परम पिता , परम माता या आदि अनादि भगवन या खुदा के आर्गुमेंट को क्योकि जैसा तुम कहते हो अगर वैसा ठीक वैसा ही भगवान् है तो विश्वास करो उसके लिए तुम्हारी हस्ती किसी बेक्टेरिया से ज्यादा कुछ भी नहीं है। तुम क्यों अपनी फजीहत करवाते हो उसको याद करके? पर तुम Burdon of Proof लॉजिकल fallacy करते हो इसीलिए मैं इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा।
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पर तुम देखो ये सब पढ़ कर ना फ़िक्र मत करो हमारा डार्क ऐज भी खतम होगा। हर कौम का एक ऊंचा तो एक नीचा वक़्त आता ही है। कभी यूरोप अंधेरे में था, अंध धार्मिक कट्टरता और मारकाट थी । बाइबिल के विपरीत बात करने वाले दार्शनिकों और विचारकों पर बड़ा जुल्म था। फिर वहाँ भी वक़्त बदला और आम जनता ऊपर तक भर गई। पुनर्जागरण हुआ और वैज्ञानिक वैचारिक क्रांति हुई जिसने औद्योगिक क्रांति को जन्म दिया। नस्लीय संघर्ष भी बढ़ा और राजनीति , अर्थव्यवस्था, विचारधारा और नस्लीय श्रेष्ठता में नाम पर क्रांति से लेकर विश्व युद्ध भी हुए एक पूरे युग का अंत हुआ 1950 के बाद तो विश्व बिल्कुल बदल गया।
यह तो प्रत्येक कौम की नियति है । ऊपर नीचे फिर ऊपर फिर नीचे क्योंकि बदलाव का ग्राफ लीनियर नही है पर Continuous अर्थात सतत जरूर है। कभी मायन , मिस्र , सिंधु और ग्रीको की संस्कृति अभेद्य और विराट थी। वक़्त पलटा और मिटटी हो गए। कभी बर्तानिया की पूर्व से पश्चिम हुकूमत थी और कभी अमेरिका ने दुनिया पर साम. दाम, दंड, भेद से राज किया था। चीन का भी वक़्त आया और उसने भी बड़ा कुबद कर रखा है। भारत का भी आयेगा ये तो निश्चित है कब हम ये विश्व गुरु का गुजरा ज़माने का पुराना फटा ढोल, गोल पोल बजाना बंद करे और कब सीखना शुरू करे इसके लिए प्रयास करो।
लोगो से चिढ़ो मत. उनको दुत्कारों मत, डरो मत उनपर तरस मत खाओ और ये स्वर्णिम स्वनिर्मित आइवरी टॉवर से उतरो और इस भीड़ में से अपने काम के बालक छांट लो और लग जाओ बदलाव लाने की दिशा में, मैं सच कहता हूँ मन लगाकर अगली पीढ़ी को समर्थ और सक्षम बनाने का प्रयास करो और तुमको भी कही फुटनोट मे याद किया जायेगा।
मैं ज्यादा नहीं कहूंगा क्योकि परम सत्य को कहा नहीं जा सकता है और मुझे पता भी नही की परम सत्य क्या है। मेरे विचार बहुत सटीक रूप से बिखरे बिखरे है।
-m.Dinesh
Dinesh Mandora All rights reserved ©
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