कुंठा अर्थात Frustration
इन्हें लंबोदर कैसे कहे!? "ॐ लम्बोदराय नमः" कहा सार्थक हो रहा है?
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मैं धार्मिक मामलों पर टिप्पणी नहीं करता हूँ क्योकि अधार्मिक लोग गाली-गलौच पर उतर आते है। मैं तुम्हारे किसी भी भगवान, खुदा या जीसस में कोई श्रद्वा या विश्वास भी नहीं रखता हूँ। मेरी किसी भी भगवान् या परम शक्ति को लेकर को लेकर कोई निजी अवधारणा नहीं है क्योकि
Gott ist tot! Gott bleibt tot! Und wir haben ihn getötet!“
-Friedrich Nietzsche
(Die Fröhliche Wissenschaft)
ऐसे ही इन्होने बाल मन पर अपने चंचलता से चाप छोड़ देने वाले हनुमान को ऐसा रूप दे दिया की अब कारों , बाइक पर एक गुस्से से भरा हुआ चेहरा बस तुम्हे देखता है। ये कहते है ये इनका attitude है? ये इनका नहीं तुम्हारा attitude है क्योकि तुम उनसे बुद्धि और विध्या नहीं उनसे बल मांगते हो जो की तुम्हारे पास नहीं है। बलशाली बनने के लिए किये जाने वाले कठिन परिश्रम तुम कर नहीं सकते हो तो तुमने अपनी आत्म कुंठा को उनके ऊपर थोप दिया।
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and I turned out to be quite fine I think so
पर ये हनुमान कौनसे है ? ये हनुमान कम Chinese माइथोलॉजी का Sun Wukong ज्यादा लगता है।Image Credit : Google Image
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क्या यह रामभद्र:,शाश्वत: राजीवलोचन: रघुपुंगव: जानकीवल्लभ: विश्वामित्रप्रिय: श्री राम लगते है ?
- यह जितामित्र: श्री राम तो हो सकते है पर जनार्दन: श्रीराम श्रीराम भी है क्या ?
- यह खरध्वंसी वालिप्रमथन: विराधवधपण्डित: श्रीराम तो हो सकते है पर यह सुमित्रापुत्रसेवित: चित्रकूटसमाश्रय: दण्डकारण्यवासकृत् श्रीराम भी है क्या ?
- यह ऋक्षवानरसंघाती धन्वी दूषणत्रिशिरोऽरि: दशग्रीवशिरोहर: श्रीराम तो हो सकते है पर कौसल्येय: अनन्तगुणगम्भीर: धीरोदात्तगुणोत्तर: सच्चिदानन्दविग्रह: श्यामांग: श्रीराम भी है क्या ?
ऐसी ही एक आत्म कुंठा है की तुमने अपने भगवानों को नीला भी पोत दिया है। जिस भगवान् का नाम ही श्याम है, कृष्ण है उसको नीला कर दिया है। लेकिन तुम्हारे धर्माचार्य जानते है उन्होंने और वाल्मीकि जी ने भूगोल पढ़ा होगा इसीलिए अयोध्या में राम की मूर्ति उनके बाल्य स्वरूप का एक अच्छा प्रदर्शन है। सटीकता मुझे नहीं पता पर वह अच्छा है। भगवन तो मेघवर्ण है और वो नीलाम्बुज, नीलमणि, गगनसदृश इसीलिए नहीं की उनका रंग ऐसा है। उन्हें नील वर्ण का कहना वो इतना दार्शनिक है की जैसे अनंत नीला क्षीरसागर है। मानव मन जिसे क्षीरसागर की संज्ञा दी गई श्रीहरि तो उसमे निवास करते है और क्योकि तुम्हे दर्शन समझ नहीं आता है तो उसके चारों तरफ तुमने कहानियों की मोटी भद्दी दीवारे खड़ी कर ली है।
आगमनम् देवता:, गमनम् राक्षस:
इस क्षीरसागर में नमक तो तुम खुद ही मिला रहे हो और टिप्पणी दूसरे धर्मो पर करते हो। इसीलिए भी क्योकि हमेशा गलत भगवान से गलत चीज मांगने की आदत जो लग गई है तुमको !
शंकर से योग नहीं भोग मांगते हो ,
हरी से भजन नहीं भोजन मांगते हो,
सरस्वती से मुद्रा मांगते हो,
दुर्गा से शांति मांगते हो,
लक्ष्मी को नियति मानते हो और
गणेश को पानी में बहाना जानते हो।
वेदो से आधुनिक ज्ञान मांगते हो
उपनिषदों के क्या नाम जानते हो ?
अपने अस्तित्व को हर मंच से चीखने वाले
तुम विज्ञान से प्रमाण मांगते हो।
निज धर्म प्रति स्वं विकारी, विपरीत काल मति तुम्हारी
टीका टिप्पणी दोष अघाड़ी, स्वधर्म हानि नियति तुम्हारी।
-m.दिनेश
m.दिनेश©
-Dinesh Mandora
Dinesh Mandora All rights reserved ©
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