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भारत के चन्द्रयान -3 मिशन पर उठते प्रश्न समाज में वैज्ञानिक शिक्षा और स्वभाव का आभाव है।

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इस तरह के प्रश्न हमेशा ही उठते है की क्यों भारत जैसे विकाशील देश को इतने एडवांस स्पेस प्रोग्राम की जरुरत है? जब भी इसरो ने कोई स्पेस मिशन लांच किया है तब ही ऐसे प्रश्न आने लगते है, जैसे मंगल पर क्यों जाना है? चाँद पर क्यों जाना है? मानव मिशन क्यों भेजना है? सूर्य के अध्ययन का मिशन क्यों भेजना है? इतना पैसा यहाँ क्यों लगाया जा रहा है? इस पैसे का उपयोग गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, चिकित्सा इत्यादि में क्यों नहीं किया जा रहा है?  इस प्रकार के प्रश्नों को सुनकर गरम होने की बजाय या किसी को मूर्ख सिद्ध करने की बजाय बहुगण यह नहीं सोचते है की यह कितना सरल और मौलिक प्रश्न है और ऐसे प्रश्नो का उठना एकदम उचित है।  सर्वप्रथम आप यह समझ लेवे की इस प्रकार के प्रश्न "अंतरिक्ष कार्यक्रमों और सामाजिक कल्याण के बीच एक विकासशील देश होने के नाते सीमित संसाधनों के आवंटन और हमारी एक राष्ट्र के रूप में प्राथमिकताओं पर आधारित होते है। "   यह प्रश्न मूलत: प्रश्नकर्ता के STEM शिक्षा और वैज्ञानिक अन्वेषण, अंतरिक्ष अन्वेषण और उसकी प्रौद्योगिकी के विकास और अभियांत्रिकी तथा इस क्षेत्र में सीधे निवेश से अन्य ...

भगवान का कौनसा आयाम है? (The Dimension of God)

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 भगवान का कौनसा आयाम है? (Which is the Dimension of God?) God is a mean kid sitting on an anthill with a magnifying glass . . . सोचिये आप दीपावली पर घर की सफाई कर रहे है और अचानक आपको अपना पुराना कॉस्मेटिक बॉक्स मिला। आपने उसको खोला और आपको कुछ आकृतियाँ हिलती नजर आई। आपने गौर से देखा और आप अचंभित हो गए क्योकि ये जो था वो समझ से परे था। अपने इस पुराने सामान में आपने एक द्विआयामी संसार की खोज कर ली। इस दुनिया में समय को महसूस करने का आपका 1 सेकंड उस संसार के जीवो का 1 वर्ष है। अगर आप 2D जीवन के भगवान बनना चाहते है तो आपको क्या करना होगा ? कुछ नहीं बस एक बार उनके सामने 1 सेकंड के लिये प्रकट हो जावे, इस से कम आप नहीं हो सकते क्योकि आप भी समय के नियमो से बंधे हुए है। किसी एक को हवा में उठाकर वापस रख देवें। रातों रात उनके संसार में आपके नाम का कल्ट बन जायेगा। धीरे-धीरे वो धर्म भी बन जायेगा और शायद कुछ ही समय में कोई धार्मिक दस्तावेज या किताब भी लिख दी जावे जिसमे आपके बारे में क्विदंती/कहानियां या आपके दिए संदेशो का संकलन हो। कुछ ही समय में फ़िरक़े भी बन जायेंगे और 2 धाराएं बह निकलेगी। एक ध...

फिजिक्स का सबसे सफल "असफल प्रयोग"

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यह वह प्रयोग था जिसने आइंस्टीन के सापेक्षिता सिद्धांतो और क्वांटम भौतिकी की नींव रखने में अभूतपूर्व योगदान दिया। इस एक प्रयोग ने वैज्ञानिक समाज को अपने कई मूल सिद्धांतो की जाँच करने के लिए फिर से मजबूर कर दिया और आज के परिपेक्ष्य में जब आधुनिक भौतिकी शब्द अप्रासंगिक है तब इस सिद्धांत ने चिरसम्मत भौतिकी से वैज्ञानिक ज्ञान को आधुनिक भौतिकी अर्थात मॉडर्न फिजिक्स की तरफ मोड़ दिया था।    This is the story of the world's most successful " failed experiment ". This is the story of Michelson-Morley Experiment .  माइकलसन -मोरले प्रयोग की   1887  जुलाई में वेस्टर्न रिजर्व विश्वविद्यालय के छात्रावास में दो भौतिक वैज्ञानिकों द्वारा किया गया था।  पहले भौतिक वैज्ञानिक  अल्बर्ट इब्राहिम माइकलसन ( ALBERT ABRAHAM MICHELSON ) थे। इनका जन्म पोलैंड में हुआ था। जब वह तीन वर्ष के थे तब उनके माता-पिता 1855 में ही अमेरिका आ गए थे। 17 वर्ष की उम्र में उन्होंने U.S. नेवल एकेडमी में प्रवेश लिया, जहां प्रकाशिकी( Optics ) की कक्षा में वह प्रथम थे। भौतिकी में अमेरिका का पहला न...

इतिहास बनाम चयनात्मक अनपढ़ता

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Curse of Selective Illiteracy    एक अजीब सी मूर्खता का निर्माण हो गया है आजकल चारों तरफ और यह मूर्खता सामाजिक तो है ही सांस्कृतिक भी है। यह है स्वयं का अद्भुत गौरवशाली इतिहास पढ़ने का और उसकी वाहवाही करने का पर उसके लिए लेशमात्र भी प्रयास नहीं करने का दोगलापन लेकिन उस अनकहे इतिहास की डींग हाँकने में जरा भी पीछे नहीं रह जाना। यह किस प्रकार का सामाजिक बौद्धिक दिवालियापन है जहाँ तथाकथित शिक्षित वर्ग ही स्वाध्याय से कौंसो दूर है। यदि कोई इक्का दुक्का व्यक्ति किसी प्रकार कुछ पढ़ता भी है तो उनकी जबान हो या लेखनी वैचारिक पूर्वाग्रह का अपना विष प्रकट करती रहती है। लेकिन इस से भी बढ़कर समस्या यह है कि बड़ा सामाजिक तबका किताबों से इतना दूर है कि अपनी कला , संस्कृति , इतिहास , सभ्यता के विकास वैज्ञानिक और तकनीक ज्ञान के विकास , वैचारिकता और दर्शन में योगदान सभी से ये तबका अंजान है और यही स्वराष्ट्र , स्व-संस्कृति के प्रति अज्ञान , स्थिरता और जड़त्व के कारण ही पूर्व में भी भारतीय संस्कृति का हास्य और हास दोनों हुआ है। क्या पढ़े क्या नहीं पढ़े का प्रश्न तो बाद में आता है पहले क्या हम...

क्या विज्ञान अंधविश्वास को बढ़ावा दे सकता है?

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क्या विज्ञान अंधविश्वास को बढ़ावा दे सकता है? क्यों ना इसमें एक बात और जोड़ दी जायें की क्या विज्ञान विश्वास को बढ़ावा देता है ? बिल्कुल नहीं । विश्वास, अंधा-विश्वास, अविश्वास और कुमार विश्वास किसी का भी विज्ञान से कोई लेना देना नहीं है। हवा-पानी, जीवन-बीमारी-मृत्यु, सूर्य,चंद्रमा, मोबाइल, रेडियो तरंग,परमाणु, फोटोन इत्यादि में आप विश्वास नहीं करते हो यह सब वैज्ञानिक और प्राकृतिक सत्य है। कल को कोई विद्युत चुम्बकीय विकिरण के अस्तित्व को ना माने तो क्या फर्क पड़ जायेगा ? उनके मानने या ना मानने से या फिर किसी के भी ना मानने से कभी कोई वैज्ञानिक तथ्य नही बदल जाता है।  कल को कोई कहे में साँप का काटा मेरे बाबा या पीर जी के दिए बीजमंत्र और ताबीज से छुवाकर सही कर दूंगा तो यह उनका व्यक्तिगत मामला है, क्या मौत विश्वास करने से  रुक जाएगी ? कैंसर फैक्ट है विश्वास नहीं। अगर किसी को अपनी माँ की बातों पर विश्वास नहीं की उसके मौजूदा पापा ही उसके पापा है तो डीएनए जाँच करवा लीजिये। अगर जांच में मैच नहीं होने पर भी मम्मी इस बात पर टिकी रहे तो वह व्यक्ति विश्वास करेगा ? या वैज्ञानिक सबूत का चुनाव ...