मुझे नहीं लगता है भारतीयों को अपना इतिहास लिखना भी आता है और इसीलिए जनमानस को इतिहास पढ़ना भी नहीं आता है। ज्यादातर तो मैंने यही पाया है की किसी भी करैक्टर के बारे में बात करते समय तथाकथित भारतीय इतिहासकारों ने अधिकतर समय उनका बस mythologization ही किया है। यहाँ तक की राजा अपनी माँ के गर्भ से सीधा अपनी माता और पिता के बीच संभोग से नहीं किसी ना किसी प्रकार के Divine Intervention से ही पैदा होते है।
ये Divine इंटरवेंशन का एक कारण यह भी है की सामान्य बुद्धि यह समझने में विफल है की असामान्य लोग कुछ नहीं होते है। राजा-रंक, आम- खास, चपरासी -अधिकारी, संत-शैतान सब एक ही समाज में एक साथ विचरते है और इस बात की प्रबल सम्भावना भी है की आप एक दूसरे के पड़ोसी है। 16वी सदी में जापान में एक तोयोतोमी हिदेयोशी(Toyotomi Hideyoshi) नाम का एक बड़ा सामंती राजा हुआ। वो एक Daimyo था जो की एक बड़ा ओहदा होता है। अपने जन्म के मूल रूप से वो एक सामान्य आदमी था जिसने लार्ड ओडा नोबुनागा के पास एक सैनिक के रूप में अपना सफर शुरू किया लेकिन काबिलियत के दम पर ऊपर पंहुचा। Daimyo बनने के लिए उसने भी अपने कद और पहुंच का उपयोग किया और खुद को एक Divine and ancient Japanese lineage में वो पैदा हुआ है ऐसे नये प्रमाण उसने बनाये। इसी तरह, राजस्थान के महाराणा कुंभा के बारे में कहते है की वो कुंभास्वामी की कृपा से कुम्भ से उनकी उत्पति है। मराठों के सबसे बड़े और प्रख्यात वीर श्रेष्ठ शिवाजी ने भी यही किया। आपको एक राजा के तौर पर अगर Iron Fist से शासन करना है तो तथाकथित शुद्ध-रक्त, श्रेष्ठ जाति-गोत्र को सर्वोपरि मानने वाले नस्लवादी प्रशासकों और साथी राजाओं को अपना सहयोगी बनाने के लिए ऐसा करना महत्वपूर्ण था। अन्यथा एक आम आदमी आपको अपने राजा के रूप में स्वीकार नहीं करता है।
ये Divine इंटरवेंशन किसी ना किसी तरह से कई बात तो संभोग की आवश्यकता को भी खत्म कर देता है। प्रत्येक राजा एक वीर, पराक्रमी, उदार, महाबलि है और कभी भी उसने जीवन में कोई Immoral काम नहीं किया है ! उसकी एथिकल Integrity हमेशा रॉक सॉलिड है और किसी Immoral या unethical काम उसके पीठ पीछे हुआ है इसके लिए उसकी Alibi बहुत रॉक सॉलिड लिखी जाती रही है। उनकी प्रजा के बारे में कभी कोई बात नहीं की जाती है, कभी इकोनॉमिक Disparity की बात नहीं होती है और कभी भी सोशल Political इश्यूज पर बात नहीं होती है। अगर होती है तो बस प्रशासन चलाने के तरीको पर और उनके सैन्य और संधि बल और राजनैतिक समझ, कूटनीति और उनके परिवार और वंशजों की बात की जाती है लेकिन कभी विद्रोह और विरोधों पर कोई डिस्कशन नहीं किया जाता है।
राजा चाहे कितना ही सामान्य रहे या कितना ही साधारण स्वभाव और व्यवहार करे बस उनके हर कृत्य में किसी ना किसी प्रकार का अलौकिक तामझाम ढूंढ लिया जाता है। इनका ज्यादातर इतिहास तो दरबारी लेखकों ने लिखा है जिनकी कलम और जुबान में राजा के प्रति वफ़ादारी से ज्यादा नौकरी की सुरक्षा की चिंता रहती थी। ख़ास तौर पर राजस्थान जैसे प्रदेश में जहाँ किसी भी राजा को बस बात बात पर देशभक्त और वचनबद्ध बनाने की होड़ लगी रहती थी। आंतरिक सत्ता और सिंघासन के संघर्ष को भी राजा की कूटनीति का नाम दिया गया और खून के रिश्तो में हत्याओंको देश के गद्दारो का वध या उनका मौलिक और नैसर्गिक नाश डिक्लेअर कर दिया जाता है।
राजा अय्याश और अफीमची हो किसी स्त्री के साथ भरपूर नशे में काम में लीन हो और उसके प्रतिद्वंदी उसपर तलवारों से हमला कर दे तब भी वो हाथ में लोटा लेकर पलंग से बंधा होकर भी उनपर टूट पड़ता है और खुद लड़ते-लड़ते मर जाता है। लेखक ये मानने को तैयार नहीं की He was drugged by a woman he used to sleep with and got assassinated by his own relative cold blooded क्योकि ये मान लेने से राजा की Divinity और उसके पौरुष में कमी आ जाती है।
मुझे समझ आता है राजा Divine ही माना जाता रहा है पर ये Divinity का असर हमारी स्कूल और कॉलेज की किताबे में क्यों है ? क्यों नहीं उन्हें एक ऐतिहासिक करैक्टर की तरह प्रेजेंट किया जाता है और हमेशा इतिहास में से सही-गलत और अच्छा-बुरा निकालने की कोशिश की जाती है।
शायद इसीलिए अंग्रेजो ने भी कभी भारतीयों को उनका इतिहास लिखने नहीं दिया क्योकि उनको लगा ये लोग Reel और Reality के बीच फर्क समझ नहीं ही पाते है। यही कारण है की भारत का इतिहास इतने confusion से भरा हुआ रहता है और ज्यादातर के लिये उनकी Mythology ही उनकी हिस्ट्री है और इसीलिए वो evolutionary बायोलॉजी और Anthropology के फ्रेमवर्क में बैठे मानव समाज, प्रद्योगिकी, ज्ञान-विज्ञान, दर्शन और निति के कलान्तरित होते नियत विकास को समझने में असक्षम होते है। क्योकि यह उनके रूढ़िवादी आसमानी या जमीनी किताब के एक सरल एक्सप्लनेशन से कोसों दूर कठिन और दुर्गम रास्ता मालूम होता है और इसीलिए ऐसा समाज विज्ञान पढ़ने की बजाय अंधविश्वास में विज्ञान खोजने के लिए तत्पर रहता है।
अगर एक समाज विश्वास करता है की उनकी धार्मिक किताब आसमान से उतरी है या भगवान का बेटा पानी पर चला था या उनके देवता उड़ सकते है तो उन्हें एयरोप्लेन की इंजीनियरिंग हमेशा अपने देवताओं के दिव्य चमत्कारों के सामने गौण ही लगेगी। यही हाल हर प्रकार के ज्ञान-विज्ञान और प्रोद्योगिकी के विकास के लिए होगा और हमेसा यह व्यक्य सुनने को मिलेगा की "इसमें नया क्या है ये तो हमारे वेदो में लिखा हुआ है।" या "यह तो हमारे ऋषि मुनियों ने खोज दिया है।"
अन्धविश्वास ज्यादातर तो तथाकथित डिग्रीधारी ही फैलाते मिल जायेंगे, इसीलिए आज भी भारतीय पढ़ने की बजाय यह कहने में ज्यादा गर्वित मासूस करते है की "हमें तो जी हमारा इतिहास पढ़ाया ही नहीं गया है" और इसीलिए किताबे केवल धूल खाती है जिन्हे स्कॉलर पढ़ते है। अगर कोई पढ़ा लिखा अनपढ़ भारतीय इतिहास की कुछ किताब पढ़ भी लेता है तो अपने तथाकथित मौजूदा हालातों के लिये यवनो या अंग्रेजो के ऊपर तुरंत दोष मढ़ देता है।
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