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This is Not for you Mr. Gullible

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Does the development of technology break the monopoly of the elite and the rich over knowledge? Development of technology and providing it for masses is the idea of the global elite. The days of organized surveillance by the state institution are an old phenomenon. Today everyone of us holds more than one electronic gadget that with a few steps can be converted into a surveillance device. Data and information is the key to profile any individual. Algorithms of any application we use know more about us than we know about ourselves, type of food we eat , people we talk to and political and religious dogma we hold so dear.    Elite does not hold any monopoly on the Information of any kind They just censors or constraint specific areas of the free flow of the information. That is why I argue against this idea because I think that the monopoly of the elite on crucial information, data, research, experiment is always there and they know that masses won't be able to comprehend the tr...

नास्तिक हो या Atheist ?

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क्या तुम कभी ऐसे व्यक्ति से मिले हो जो कहता है मैं भी पहले नास्तिक था लेकिन और उसके बाद उसने जो भी कारण बताया वो मैंने सुना नहीं क्योकि मैं उठ के चला जाता हूँ। मैं ऐसे गजोधर लोगो से कोई बातचीत नहीं करता हूँ क्योकि तुम कभी भी नास्तिक नहीं थे तुम बस अपनी मोर्टल समस्याओ से ग्रसित थे। तुमने माँगा तुमको मिला नहीं तो तुम को किसी भी भगवान् पर विश्वास नहीं। ऐसा लड़कपन का धार्मिक विश्वास या श्रद्धा श्राद्ध पक्ष की तरह होती है। ग्रह बदले श्राद्ध पक्ष खत्म ! Do you really think की किसी भी भगवान को इस तरह के किसी भी विश्वास की कोई आवश्यकता है? ऐसे तथाकथित पूर्वर्ती नास्तिक के पास तर्क नहीं होते क्योकि उनकी लॉजिक और रीजनिंग में अच्छी या दोयम स्तर की ट्रेनिंग भी नहीं हुई होती है। लगभग सभी आस्तिकों, नास्तिकों, पूर्वर्ती आस्तिकों, भूतपूर्व नास्तिकों इत्यादि का जीवन चक्र Burdon of Proof लॉजिकल fallacy के भरोसें घिसट रहा होता है अर्थात मैंने तो स्टेटमेंट दे दिया है अब समस्या है कि सामने वाला स्टटेमेंट के विरोध या समर्थन में तर्क या एविडन्स प्रस्तुत करे। मैं धार्मिक मामलों पर टिप्पणी नहीं करता हूँ क्योकि ...

कसम है तुम्हे जो तुमने कभी सीखा !

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लड़कियों को Bad Boys पसंद आते है इसका Evolutionary कारण है वो कभी बाद में समझाऊंगा। एक उम्र होती है जब लड़कियों को ये नाफरमान, ढर्रे से अलग हटकर चलने वाले अजीब से कपडे पहले झगड़ालू लड़के पसंद आते है। महिलाओ को एक सेवियर (savior) सिंण्ड्रोम होता है। उन्हें लगता है कि मैं अपने प्रेम और समर्पण से इसको बदल दूंगी। ऐसा हर उम्र की महिला में होता है किसी को ज्यादा और किसी को कम पर होता है। ये सोचती है की अब क्योंकि मैं इसकी अँधेरी जिंदगी मै रोशनी की उजली किरण बनकर आ चुकी हूँ और मेरी सीमाओं से बाहर जाकर भी मैं इसको बदल दूंगी। वो लड़कियां इन Bad Boys पीछे अपना वक़्त, भावनायें और अधिकतर मामलों में अपना जिस्म समेत सर्वस्व न्यौछावर कर देती है। लेकिन क्योकि Bad Boys तो रहा Bad Boy और उसको अब जो चाहिये था वो मिल चुका है तो अब वो इस स्वघोषित रोशनी की किरण को लात मारकर इसको सेल्फ हेट और आइडेंटिटी क्राइसिस के ज्वालामुखी में गिरा देता है। यहाँ सालों तक पड़े रहे के बाद, तपने के बाद और व्यक्तित्व में परिवर्तन के बाद यह लड़की अगर इसने नफरत करना और सभी पुरुषों को एक ही रस्सी से हाँकना नहीं सीखा है तो अ...

आत्मा अमर होगी पर शरीर नश्वर है।

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  मौत का कुआँ और GYM   शीर्षक से  मैंने यह लेख मेरी फेसबुक पोस्ट के लिये नवंबर 2021 में लिखा था ,जहां मेरे एक मित्र ने बीबीसी की एक डॉक्यूमैंट्री शेयर की थी। जिसका उद्देश्य कुछ भी रहा हो पर उसकी सफलता यह रही की उसे देख आम जनमानस ने मन में "जिम को राक्षसी" जरूर मान लिया होगा। वीडियो यही था की कैसे जिम जाना आप को बीमार, बहुत बीमार बना सकता है; इतना सीरियस तो ये लोग धूम्रपान के  Advertisement  में भी नहीं रहते है। बीबीसी ने इतनी जोरदार डॉक्यूमेंट्री बनाई है जैसे जिम ना हुए मौत के कुँए हो गये। वजन उठाने से मौत हो जाएगी इतना मत उठाओ, इतना व्यायाम मत करो, स्टेरॉइड लेते है सब लोग जिम में, प्रोटीन पाउडर मत खाओ, प्री वर्कआउट मत लो और भी ना जाने क्या हो जायेगा। वैसे तो भारतीय कार्डियोवैस्क्युलर ,रेस्पिरेटरी और मेंटल हेल्थ में सबसे पिछड़े है पर व्यायाम नहीं करने के इनके पास 101 घरेलू तत्काल बहाने मिल जायेंगे। बीबीसी यह बताना भूल गया कि जिस स्तर के भारी व्यायाम की वह बात कर रहे है उसके लिये वर्षों वर्षों की मेहनत की आवश्यकता है। यह आपके साथ तब तो बिल्कुल नही होगा जब आप ...

Woke Spiritual अफीम

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सारे Spiritual अफीमचीयों में एक कॉमन बात यह है की क्योकि अब इनके गुरूजी/किताब/बाबा ने कह दिया है की मेरे पास आने भर से ही तुम एक अद्वितीय पथ पर निकल चुके हो तो इनकी छाती में हवा भर जाती है। बिल्कुल पहले ही मिनट से ये सामान्य व्यक्ति को बहुत नीचा करके आंकते है , कैसे ? अब क्योकि इनका खुद कोई acquire knowledge तो कुछ होता नहीं और ना ही इन्होने दिमाग को इतनी स्वतंत्रता दी हुई होती है की वह बेसिक ऑब्जरवेशन से कुछ सीखे। इनसे किसी भी विषय पर बात कीजिये तो इनका 90% तर्क चेतना अर्थात consciousness के आस-पास बना होता है। चेतना का इनका एक अलग ही डिस्कोर्स चल रहा है। चेतना क्या है, इनको ऐसे साधना है , यह किस प्रकार की होती है, किस प्रकार की नहीं होती है इत्यादि। इनको पूछो चेतना का फिजिकल मतलब तो बता ! तब इनके पास कोई factual बात नही होती है क्योकि इस विषय साइंटिफिक पेपर लिखने के लिए एक्सपेरिमेंट जरुरी है, वक़्त लगता है और बहुत rigorous साइंटिफिक methodology से गुजरना पड़ता है। आप किसी न्यूरोसाइंटिस्ट से पूछो की चेतना क्या है तो वो तो कह देते है की भई Consciousness को हम अभी समझ रहे है। यह कहा है इस...

आध्यात्म और विज्ञान का विवाद जबरदस्ती का विवाद है।

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आध्यात्म और विज्ञान का विवाद जबरदस्ती का विवाद है। मैं तो इसको कोई डिबेट भी नहीं मानता हूँ। आध्यात्म व्यक्तिगत है आपको परमतत्व में मिलना है, परम तत्व से जुड़ना है, कुण्डलिनी जगानी है ये सब फैंसी शब्दों में से क्या चाहिए यह आपका व्यक्तिगत चुनाव है। आपका ये परालौकिक अनुभव केवल आपका है और अगर बुद्ध सही है तो सबको अपना रास्ता खुद खोजना है। जैसा की ओशो कहते है  "मेरे निकट बैठने से तुममें भी रस की कुछ बूंदे प्रकट होगी। तुममें आनंद तो आयेगा पर वह क्षणिक होगा। अमृत तुम में भी फूटे इसके लिये तुम्हे ही प्रयास करना होगा।" विज्ञान व्यक्तिगत नहीं है यह सार्वत्रिक है। नियतांक सार्वत्रिक है, प्रकाश का वेग सार्वत्रिक है, नियम भी सार्वत्रिक है और समान समय पर सापेक्षिक भी है। कठिन गणित और भौतिकी प्रकृति के नियम और उसकी कार्यविधि समझने का तरीका है। प्रकृति इसी भाषा में बात करती है। यह कठिन भाषा है यह  अवकल समीकरणों , कंप्यूटर कोड, उष्मागतिकी और टोपोलॉजी की भाषा है।  यह सबको समझ नहीं आती है, आ सकती है पर कौन प्रयास करे? इसीलिए इसको समझने के लिये बहुत कठिन परिश्रम करना पड़ता है। सीमित खोज नहीं ...

भारत के चन्द्रयान -3 मिशन पर उठते प्रश्न समाज में वैज्ञानिक शिक्षा और स्वभाव का आभाव है।

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इस तरह के प्रश्न हमेशा ही उठते है की क्यों भारत जैसे विकाशील देश को इतने एडवांस स्पेस प्रोग्राम की जरुरत है? जब भी इसरो ने कोई स्पेस मिशन लांच किया है तब ही ऐसे प्रश्न आने लगते है, जैसे मंगल पर क्यों जाना है? चाँद पर क्यों जाना है? मानव मिशन क्यों भेजना है? सूर्य के अध्ययन का मिशन क्यों भेजना है? इतना पैसा यहाँ क्यों लगाया जा रहा है? इस पैसे का उपयोग गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, चिकित्सा इत्यादि में क्यों नहीं किया जा रहा है?  इस प्रकार के प्रश्नों को सुनकर गरम होने की बजाय या किसी को मूर्ख सिद्ध करने की बजाय बहुगण यह नहीं सोचते है की यह कितना सरल और मौलिक प्रश्न है और ऐसे प्रश्नो का उठना एकदम उचित है।  सर्वप्रथम आप यह समझ लेवे की इस प्रकार के प्रश्न "अंतरिक्ष कार्यक्रमों और सामाजिक कल्याण के बीच एक विकासशील देश होने के नाते सीमित संसाधनों के आवंटन और हमारी एक राष्ट्र के रूप में प्राथमिकताओं पर आधारित होते है। "   यह प्रश्न मूलत: प्रश्नकर्ता के STEM शिक्षा और वैज्ञानिक अन्वेषण, अंतरिक्ष अन्वेषण और उसकी प्रौद्योगिकी के विकास और अभियांत्रिकी तथा इस क्षेत्र में सीधे निवेश से अन्य ...